UP Board and NCERT Solution of Class 10 Science Chapter-5 Life Processes ( जैव प्रक्रम ) Long answers

UP Board and NCERT Solution of Class 10 Science [विज्ञान] ईकाई 2 जैव जगत –Chapter- 5 Life Processes ( जैव प्रक्रम ) दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 

प्रिय पाठक! इस पोस्ट के माध्यम से हम आपको कक्षा 10वीं विज्ञान ईकाई 2  जैव जगत (Organic world) के अंतर्गत चैप्टर 5 -जैव प्रक्रम  पाठ के दीर्घ उत्तरीय प्रश्न  प्रदान कर रहे हैं। UP Board आधारित प्रश्न हैं। आशा करते हैं हमारी मेहनत की क़द्र करते हुए इसे अपने मित्रों में शेयर जरुर करेंगे।

पोषण, प्रकाश संश्लेषण, मनुष्य का पाचन तन्त्र, श्वसन, परिवहन, वाष्पोत्सर्ज, मानव में उत्सर्जी तन्त्र

Class  10th  Subject  Science (Vigyan)
Pattern  NCERT  Chapter-  Life Processes

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. मनुष्य के उत्सर्जी तन्त्र का सचित्र वर्णन कीजिए।

अथवा (i) मानव मूत्र तन्त्र का चित्र बनाइए और उसमें निम्नलिखित भागों का नामांकन कीजिए-

(a) वृक्क (b) मूत्रवाहिनी (c) मूत्राशय (d) मूत्र मार्ग।

(ii) सामान्य मानव मूत्र के दो प्रमुख घटकों के नाम लिखिए।

उत्तर-                                  मनुष्य का उत्सर्जी तन्त्र (Excretory System of Human)

शरीर में उपापचय क्रियाओं के फलस्वरूप बने नाइट्रोजन वर्ज्य पदार्थों को शरीर से बाहर निकालना उत्सर्जन (excretion) कहलाता है। इस क्रिया में सहायक अंग उत्सर्जी अंग कहलाते हैं। अंगों के तन्त्र को उत्सर्जी तन्त्र कहते हैं। मनुष्य में मुख्य उत्सर्जी अंग वृक्क (kidney) होते हैं। यकृत (liver) उत्सर्जन क्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह अमोनिया को यूरिया में बदलता है। त्वचा, फेफड़े, आहारनाल भी उत्सर्जन में सहायक होते हैं।

वृक्कवृक्क (kidney)  संख्या में दो, उदरगुहा में कशेरुक दण्ड (रीढ़ की हड्डी) के इधर-उधर (दाएँ व बाएँ), भूरे रंग तथा सेम के बीज के आकार की संरचनाएँ हैं। प्रत्येक वृक्क लगभग 10 cm लम्बा, 6cm चौड़ा तथा 2.5 cm मोटा होता है। दायाँ वृक्क बाएँ की अपेक्षा कुछ नीचे स्थित होता है। सामान्यतः एक वयस्क पुरुष के वृक्क का भार 125-170 g किन्तु स्वी के वृक्क का भार 115-155 g होता है। वृक्क का बाहरी किनारा उभरा हुआ होता है किन्तु भीतरी किनारा भीतर की ओर भैंसा हुआ होता है जिसमें से मूत्र नलिका या वाहिनी (ureter) निकलती है। इस धँसे हुए स्थान को हाइलस (hilus) कहते हैं। मूत्र नलिकाएँ एकपेशीय थैलेनुमा मूत्राशय (urinary bladder) में खुलती है। मूत्र नलिका की लम्बाई लगभग 30-35 cm होती है।

वृक्क की आन्तरिक संरचना वृक्क की लम्ब काट में इसकी आन्तरिक संरचना देखी जा सकती है। इसके मध्य में लगभग खोखला तथा कीप के आकार का भाग होता है। यही क्रमशः सँकरा होकर मूत्र नलिका का निर्माण करता है। यह स्थान शीर्षगुहा, श्रोणि या पेल्विस (pelvis) कहलाता है। वृक्क का शेष भाग ठोस तथा दो भागों में बँटा होता है-बाहरी, हल्का, बैंगनी रंग का भाग वल्कुट या कॉर्टक्स (cortex) तथा भीतरी, गहरे रंग का भाग मेड्यूला (medulla) कहलाता है।

वृक्क में असंख्य सूक्ष्म नलिकाएँ होती हैं जो अत्यन्त कुण्डलित तथा लम्बी होती हैं। इन्हें वृक्क नलिकाएँ (uriniferous tubules) या नेफ्रॉन कहते हैं। प्रत्येक नलिका के दो प्रमुख भाग होते हैं-एक प्याले के आकार का अन्थिल भाग मैल्पीधियन कोष (Malpighian corpuscle) तथा दूसरा अत्यन्त कुण्डलित नलिकाकार (tubular) भाग जिसे स्रावी नलिका कहते हैं।

स्त्रावी नलिका एक बड़ी संग्रह नलिका (collecting tubule) में खुलती है।

प्रत्येक संग्रह नलिका एक पिरॅमिड में खुलती है। वृक्क में ऐसे 10-12 पिरॅमिड दिखाई देते हैं, जो अपने सेंकरे भाग द्वारा शीर्ष गुहा में खुलते हैं।

मूत्र के प्रमुख घटक–  मूत्र में लगभग 95% जल, 2.6% यूरिया, 2% अनावश्यक खनिज आयन तथा सूक्ष्म मात्रा में अन्य पदार्थ होते हैं।

प्रश्न 2. मनुष्य की आहारनाल (पाचन तन्त्र) का सचित्र वर्णन कीजिए।  

अथवा पाचन से आप क्या समझते हैं? नामांकित चित्र की सहायता से मनुष्य के पाचन तन्त्र का वर्णन कीजिए।

अथवा मानव पाचन तन्त्र का नामांकित चित्र बनाइए। पाचन क्रिया का भी वर्णन कीजिए।

उत्तर- पाचन (Digestion)- प्राणी द्वारा ग्रहण किये गये जटिल अघुलनशील कार्बनिक भोज्य पदार्थों को सरल घुलनशील इकाइयों में बदलने की प्रक्रिया को पाचन कहते हैं। पाचन दो प्रकार से होता है-

(i) यान्त्रिक या भौतिक पाचन, तथा (ii) रासायनिक पाचन।

मनुष्य की आहारनाल (Alimentary Canal of Human)- यह मुख से गुदा तक फैली लगभग 8-10 im लम्बी, खोखली तथा अत्यधिक कुण्डलित नलिका होती है। इसे निम्नलिखित मुख्य भागों में विभेदित करते हैं (1) मुख ग्रासन गुहिका, (2) आसनाल, (3) आमाशय, (4) छोटी आँत तथा (5) बड़ी आँत।

  1. मुखग्रासन गुहिका (Bucco-pharyngeal Cavity)- यह ऊपरी अचल तथा निचले चल जबड़े के मध्य स्थित होती. है। इसका पश्च भाग प्रसनी कहलाता है। असनी निगल द्वार द्वारा आसनाल में एवं कण्ठद्वार द्वारा श्वासनाल (trachea) में खुलती है। जबड़े दाँतयुक्त होते हैं। दाँत भोजन को काटने एवं चबाने में सहायता करते हैं। मुखग्रासन गुहिका के मध्य स्थित जीभ भोजन में लार को मिलाने तथा भोजन को निगलने में सहायता करती है। जीभ पर स्थित स्वाद कलिकायें भोजन के स्वाद का ज्ञान कराती है।
  2. ग्रासनाल (Oesophagus)- यह लगभग 25 cm लम्बी संकरी नलिका होती है जो यह गर्दन तथा वक्ष भाग से होती हुई उदर में पहुँचकर आमाशय में खुलती है। ग्रासनाल की दीवार मोटी तथा पेशीय होती है। इससे भोजन को सुगमता से निगला जा सकता है।

3.आमाशय (Stomach)- यह डायाफ्राम के ठीक पीछे उदरगुहा में  बायीं ओर स्थित होता है। यह एक थैलीनुमा, लगभग 24 cm लम्बी तथा 10 cm चौड़ी रचना होती है। आमाशय का प्रारम्भिक चौड़ा भाग ‘कार्डियक भाग’ (cardiac part) कहलाता है और अन्तिम संकरा भाग ‘पाइलोरिक भाग’ (pyloric part) कहलाता है। आमाशय का मध्य भाग ‘आमाशय काय’ या ‘फण्डिक भाग (body of stomach or fundic part) कहलाता है। भोजन का पाचन मुख्यतया मध्य भाग में होता है। आमाशय का पश्च भाग पाइलोरिक छिद्र (pyloric aperture) द्वारा प्रतणी की दीवार मोटी, पेशीय (duodenum) तमा अन्थिल होती में खुलता है। आमाशय है। पेशियों की सक्रियता के कारण आमाशय में भोजन की लुगदी बन जाती है। आमाशय की जठर मन्धियों (gastric glands) से जठर रस सावित होता है।

  1. छोटी आँत (Small Intestine)- आमाशय छोटी आँत में खुलता है। यह लगभग 6m लम्बी एक कुण्डलित नलिका होती है। इसे तीन भागों में बाँटा जा सकता है

(i) ग्रहणी, (ii) मध्यान्व, तथा (iii) शेषान्त्र।

(i) ग्रहणी या पक्वाशय (Duodenum) यह लगभग 25 cm लम्बी, लगभग ‘C’ के आकार की रचना होती है। ग्रहणी मध्यान्त्र (jejunum) में खुलती है। इसकी दोनों भुजाओं के बीच गुलाबी रंग की अग्न्याशय (pancreas) नामक ग्रन्थि होती है। यकृत तथा अग्न्याशय सामान्य पित्त वाहिनी द्वारा ग्रहणी में खुलते हैं। यकृत से पित्त रस (bile juice) तथा अग्न्याशय से अग्न्याशयिक रस (pancreatic juice) ग्रहणी में पहुँचता है और भोजन के पाचन में सहायता करता है।

(ii) मध्यान्त्र (Jejunum)- यह लगभग 2.40 m लम्बी कुण्डलित, पेशीय एवं ग्रन्थिल नलिका होती है।

(iii) शेषान्त्र (leum)- यह लगभग 3.60m लम्बी कुण्डलित रचना होती है। शेषान्त्र बड़ी आंत में शेषान्त्र उण्डकीय कपाट (ileo- caecal valve) द्वारा खुलती है। छोटी आंत की भित्ति में आन्त्रीय प्रथियाँ तथा पियर्स ग्रन्थियों पायी जाती हैं। आंत की भीतरी सतह पर रसांकुर तथा सूक्ष्म रसांकुर पाये जाते हैं। रसांकुरों के कारण अवशोषण सतह में लगभग 600 गुना वृद्धि हो जाती है।

  1. बड़ी आंत (Large Intestine)- इसकी लम्बाई छोटी आंत से कम, लेकिन चौड़ाई अधिक होती है। यह लगभग 1.50 से 1.80 m लम्बी तथा 6 cm चौड़ी होती है। इसके तीन भाग होते हैं

(i) सीकम, (ii) कोलन, तया (iii) मलाशय।

(i) अन्धान्त्र था सीकम (Caecum)- यह चौड़ी थैलीनुमा संरचना होती है। सीकम के अन्तिम भाग से संकरी, नलिका रूपी कृमि रूप परिशेषिका (vermiform appendix) लगी होती है। मनुष्य में यह एक अवशेषी अंग है।

(ii) बृहदान्त्र या कोलन (Colon)- यह छोटी आंत के चारों ओर ‘U’ के आकार की संरचना बनाती है।।

(iii) मलाशय (Rectum)- यह लगभग 12 cm लम्बा भाग होता है। इसका अन्तिम संकरा भाग गुदा (anus) द्वारा शरीर से बाहर खुलता है।

प्रश्न 3. आहारनाल से सम्बन्धित पाचक ग्रन्थियों का संक्षेप में वर्णन करते हुए उनके मुख्य कार्य लिखिए।

अथवा यकृत तथा अग्न्याशय द्वारा स्रावित पदार्थों की पाचन क्रिया में उपयोगिता को समझाइए।

उत्तर- आहारनाल से सम्बद्ध पाचक ग्रन्थियाँ होती हैं-आहारनाल से निम्न ग्रन्थियाँ साबद्ध होती हैं-

  1. लार ग्रन्थियाँ- मनुष्य में तीन जोड़ी लार अन्थियाँ होती हैं-अधोजिह्वा (sublingual), अधोहनु (sub-maxillary), तथा कर्णमूल (parotid)। इनसे स्रावित लार नलिकाओं द्वारा मुख-ग्रासन गुहिका में पहुंचती हैं।

लार में श्लेष्म तथा टायलिन एवं लाइसोजाइम एन्जाइम होते हैं। टायलिन स्टार्च का आंशिक पाचन करके शर्करा बनाता है। लाइसोजाइम जीवाणु आदि सूक्ष्म जीवों को नष्ट करता है। श्लेष्म भोजन को निगलने में सहायता करता है।

  1. यकृत- यह मनुष्य के शरीर की सबसे बड़ी ग्रन्थि है। इसका भार लगभग 1.5 kg होता है। यह उवरगुहा में डायाफ्राम के नीचे दाहिनी ओर स्थित होता है। इसका निर्माण यो पिण्डों से होता है। वाहिना पिण्ड बड़ा तथा बायाँ पिण्ड छोटा होता है। दोनों पिण्ड एक खाँच द्वारा पृथक रहते हैं। वाहिने पिण्ड पर एक गहरे रंग की लगभग 7.5 cm लम्बी और लगभग 3 cm चौड़ी शैलीनुमा संरचना पित्ताशय (gall bladder) लगी रहती हैं। यकृत कोशिकाओं में बना पित्त रस (bile juice) यकृत वाहिनी (hepatic duet) द्वारा पित्ताशय में एकत्र होता रहता है। आवश्यकता पड़ने पर पित्ताशय से पित्त रस सामान्य पित्त नलिका द्वारा ग्रहणी (duodenum) में पहुँच जाता है।

यकृत के कार्य (Function of Liver)- यकृत के प्रमुख कार्य निम्न प्रकार हैं

  1. यह पित्त स्स्रावित करता है जो भोजन के माध्यम को क्षारीय बनाता है ताकि अग्न्याशय (pancreas) के पाचक रस भोजन का पाचन कर सकें।
  2. यह भोजन की वसा का इमल्पीकरण (emulsification) करता है।
  3. आहारनाल में अवशोषित पचा हुआ भोजन सबसे पहले यकृत में पहुँचता है। यकृत शरीर की आवश्यकता के अनुसार भोजन को शरीर में भेजता है।
  4. यकृत भ्रूणावस्था में लाल रक्त कणिकाओं का निर्माण करता है। वयस्क अवस्था में मृत एवं क्षतिग्रस्त लाल रक्त कणिकाओं का विघटन करता है।
  5. यकृत शरीर में बने विषैले पदार्थों को निष्क्रिय करता है।
  6. यकृत कोशिकाएँ हानिकारक जीवाणुओं का भक्षण करके उन्हें नष्ट कर देती हैं।
  7. यकृत हिपैरिन (heparin) नामक पदार्थ बनाता है। यह शरीर में रक्त को जमने, से रोकता है।
  8. यकृत में प्रोथॉम्बिन (prothrombin) तथा फाइब्रिनोजन (fibrinogen) नामक प्रोटीन का संश्लेषण होता है। ये रक्त का थक्का जमने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  9. यकृत कोशिकाएँ विटामिन ‘A’ का संश्लेषण करती हैं और विटामिन A, B12 एवं D का संचय करती हैं।
  10. यकृत कोशिकाएँ लोहा, ताँबा आदि का भी संचय करती हैं।
  11. अग्न्याशय (Pancreas)- यह एक मिश्रित अन्यि है। यह ग्रहणी (duodenum) की भुजाओं के मध्य स्थित होती है। ग्रन्थि का अधिकांश भाग बहिःसावी (exocrine) होता है। बाह्यःस्रावी भाग का निर्माण खोखले पिण्डों से होता है। इससे अग्न्याशयी रस (pancreatic juice) सावित होता है। अग्न्याशयी रस में 98% जल तथा शेष भाग में लवण, श्लेष्म तथा एन्जाइस होते हैं। इनमें निम्न एन्जाइम्स होते हैं-

(i) अग्न्याशयी एमाइलेज (Pancreatic Amylase)- यह मण्ड को माल्टोस शर्करा में बदलता है।

(ii) अग्न्याशयी लाइपेज (Pancreatic Lipase)- यह वसा को वनीय अम्ल तथा ग्लिसरॉल में बदलता है।

(iii) ट्रिप्सिन तथा काइमोट्रिप्सिन (Trypsin and Chymotrypsin)- ये प्रोटीन्स को पेप्टोन्स तथा प्रोटिओजेज नामक मध्य क्रम की प्रोटीन्स में बदलते हैं।

अन्तःस्त्रावी भाग (Endocrine Part)- अग्न्याशय पिण्डको के मध्य संयोजी ऊतक में छोटी-छोटी कोशिकाओं के लगभग 10 लाख समूह होते हैं। इन्हें लैंगरहैन्स की द्वीपिकायें (islets of Langerhans) कहते हैं। इनका निर्माण 25% -कोशिकाओं, 60-65% β-कोशिकाओं तथा 10% कोशिकाओं से होता है। -कोशिकाओं में ग्लूकैोंन (gluca-gon) तथा कोशिकाओं में इन्सुलिन हाँगोंन सावित होता है। ये कार्बोहाइ‌ड्रेट उपापचय में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन्सुलिन आवश्यकता से अधिक शर्करा के ग्लाइकोजन (glycogen) में और आवश्यकता पड़ने पर ग्लूकैगॉन हॉयेंग ग्लाइकोजन को ग्लूकोस में बदल देता है।

प्रश्न4. पाचन किसे कहते हैं?  नुष्य में भोजन की पाचन क्रिया का वर्णन कीजिए।

अथवा पाचन में क्या तात्पर्य है? इसमें कौन-कौन से पाचक रस भाग लेते हैं? पाचन क्रिया में अग्न्याशयी पाचक रस की भूमिका का वर्णन कीजिए।

अथवा मनुष्य की प्रमुख पाचन ग्रन्थियों तथा उनसे निकलने वाले पाचक रसों के नाम लिखिए। पाचन क्रिया में उनके महत्त्व का वर्णन कीजिए।

अथवा पाचन किसे कहते हैं? मनुष्य में पाये जाने वाले पाचक रसों के कार्यों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- पाचन- जीवधारी जिस रूप में भोजन ग्रहण करते हैं, वह उसी रूप में कोशिकाओं द्वारा प्रयुक्त नहीं होता है। भोजन को कोशिकाओं में प्रयुक्त होने योग्य दशा में बदलने की क्रिया पाचन कहलाती है (अथवा), जटिल अघुलनशील भोज्य पदार्थों को सरल घुलनशील इकाइयों में बदलने की क्रिया पाचन कहलाती है। यह भौतिक तथा रासायनिक क्रियाओं द्वारा होता है। भोजन का पाचन आहारनाल में होता है। आहारनाल तथा सम्बन्धित पाचक ग्रन्थियों को सम्मिलित रूप से पाचन तन्त्र कहते हैं।

पाचक रस (Digestive Juices)- पाचन क्रिया में निम्नलिखित पाचक रस लेते हैं- भाग

(1) लार ग्रन्थियों से लार (saliva) स्रावित होती है।

(ii) आमाशय की जठर ग्रन्थियों से जठर रस स्रावित होता है।

(ii) यकृत से पित्तरस स्रावित होता है।

(iv) अग्न्याशय से अग्न्याशयी रस स्रावित होता है।

(v) क्षुद्रान्व से आन्त्रीय रस स्स्रावित होता है।

पाचन क्रिया-

(i) आमाशय में पाचन- आमाशय लगभग 25 cm लम्बा तथा 10 cm चौड़ा थैलीनुमा अंग होता है। इसका बायाँ चौड़ा भाग हृदय द्वार द्वारा आसनाल से तथा दायाँ संकरा भाग जठर निर्गम द्वार द्वारा ग्रहणी में खुलता है।

आमाशय की भित्ति ग्रन्थिल तथा पेशीय होती है। आमाशय में पेशियों के कारण भोजन की लुगदी बनती है। इसे यान्त्रिक पाचन कहते हैं। आमाशय की जठर गन्थियों से जठर रस स्स्रावित होता है। जठर रस में निम्न एन्जाइम्स पाये जाते हैं-

(क) पेप्सिन- यह प्रोटीन्स को पेप्टोन्स एवं प्रोटिओजेज में बदलता है।

(ख) जठर- लाइपेज यह वसा की कुछ मात्रा को वसीय अम्ल तथा ग्लिसरॉल में बदलता है।

(ग) रेनिन- यह दूध की घुलनशील केसीन (प्रोटीन) को अघुलनशील अवस्था में बदलकर दूध को दही में बदल देता है।

जठर रस में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCI) पाया जाता है। यह भोजन को सड़ने से बचाता है। यह रोगाणुओं को नष्ट कर देता है और भोजन के माध्यम को अम्लीय बनाता है। आमाशय में बनी भोजन की लुगदी को काइम (chyme) कहते हैं।

(ii) ग्रहणी में पाचन- आमाशय का जठर निर्गम द्वार ‘C’ के आकार की संरचना ग्रहणी या पक्वाशय में खुलता है। यह लगभग 30 cm लम्बा होता है। इसमें अग्न्याशयी रस तथा पित्त रस आकर मिलते हैं।

पित्त रस के कार्य- पित्त रस का निर्माण यकृत कोशिकाओं में होता है। यह पित्ताशय में एकत्र होता रहता है। पित्त रस में पाचक एन्जाइम नहीं होते, फिर भी यह पाचन में सहायता करता है। पित्त रस काइम को पतला एवं क्षारीय बना देता है। यह भोजन को सड़ने से रोकता है। यह वसा का इमल्सीकरण करता है जिससे वसा का पाचन सुगमता से हो जाता है। यह पित्त वर्णक बिलिरुबिन तथा बिलिवर्डिन को उत्सर्जित करता है।

आन्याशयी रस में निम्न एन्जाइम्स पाये जाते हैं-

(क) एमाइलेज- यह मण्ड की शर्करा (माल्टोस) में बदलता है।

(ख) लाइपेज- यह लगभग 80% वसा को वसीय अम्ल तथा ग्लिसरॉल में बदल देता है।

(ग) ड्रिप्सिन एवं काइमोट्रिप्पिान- ये प्रोटीन्स को पॉलीपेप्टाइड्स, पेप्टोन्स तथा प्रोटिओजेज में बदलते हैं।

(घ) न्यूक्लिएजेज- ये DNA तथा RNA को न्यूक्लिओटाइड्स तथा न्यूक्तिओसाइड्स में बदलते हैं।

(iii) छोटी आंत में पा– ग्हणी के अन्तिम छोर से छोटी आँत प्रारम्भ होती है। यह लगभग 6-7 m लम्बी होती है। इसकी भीतरी सतह पर अनेक रसांकुर (villi) पाये जाते हैं। रसांकुरों के कारण इसका अवशोषण क्षेत्रफल बढ़ जाता है।

छोटी आंत की पाचक अन्धियों में निम्न पाचक एन्जाइम्स पाये आते हैं-

(क) इरेप्सिन- यह पेप्टोन, पॉलीपेप्टाइड्स तथा प्रोटिओजेज को ऐमीनो अम्ल में बदलता है।

(ख) माल्टेज, सुक्रेज, लैक्टेज आदि एन्जाइम्स विभिन्न शर्कराओं को ग्लूकोस तथा फ्रक्टीस में बदल देते हैं।

(ग) आन्त्रीय लाइपेज- यह अवशेष वसा को वसीय अम्ल तथा ग्लिसरॉल में बदलता है।

(घ) न्यूक्लिएजेज एन्जाइम– न्यूक्लिक अम्ल (DNA, RNA) को न्यूक्लिओटाइड्स में और फिर इन्हें इसके घटकों में विघटित कर देते हैं। छोटी आंत (क्षुद्रान्त्र) में रसांकुर पाये जाते हैं। रसांकुरों में रक्त केशिकाओं तथा लसिका केशिकों का जाल पाया जाता है। क्षुद्रान्त्र में पचे हुए भोजन का अवशोषण होता है।

बड़ी आंत में पाचन- बड़ी आंत में अपचित भोजन से जल का अवशोषण होता है। अपचित पदार्थों का किण्वन तथा सड़ाव होने से मल का निर्माण होता है। मल पदार्थों को गुदा द्वारा निष्कासित कर दिया जाता है।

प्रश्न 5. मनुष्य के हृदय की बाह्य संरचना का नामांकित चित्र बनाइए तथा दोहरे रक्त परिसंचरण का महत्त्व समझाइए।

अथवा मनुष्य के हृदय की आन्तरिक संरचना तथा क्रिया-विधि का सचित्र वर्णन कीजिए।

अथवा मनुष्य के हृदय की अनुलम्ब काट (आन्तरिक संरचना) का नामांकित चित्र बनाइए।

अथवा मनुष्य में दोहरे परिसंचरण की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- मनुष्य के हृदय की बाह्य संरचना- हृदय वक्षगुहा के मध्यावकाश में अधर तल की ओर मध्य से कुछ बायीं ओर स्थित होता है। हृदय एक पेशीय अंग है। यह चार वेश्मों में बेटा रहता है। इसका निर्माण हृद् पेशियों से होता है। हृदय चारों ओर से हृदयावरण से घिरा रहता है। हृदय का अग्र चौड़ा भाग अलिन्द तथा पश्च नुकीला भाग निलय कहलाता है। हृदय के बायें भाग में शुद्ध और दायें भाग में अशुद्ध रक्त भरा रहता है। बायाँ निलय दायें की अपेक्षा बड़ा तथा पेशीय होता है। अप्र तथा पश्च महाशिराये अशुद्ध रक्त को दायें अलिन्द में और फेफड़ों से शुद्ध रक्त को फुफ्फुसीय शिरा बायें अलिन्द में पहुंचाती है। दायें निलय से अशुद्ध रक्त फेफड़ों को और बायें निलय से शुद्ध रक्त शरीर के विभिन्न भागों में पहुँचता है।

हृदय की आन्तरिक संरचना- दोनों अलिन्द अन्तय-अलिन्द पट्टी द्वारा विभाजित रहते हैं। दाहिने अलिन्द में अम्र महाशिराये, पश्च महाशिरा तथा कोरोनरी साइनस पृथक् पृथक् छिद्रों द्वारा खुलती हैं। इनके मध्य यूस्टेकी कपाट तथा कोरोनरी कपाट होते हैं। बायें अलिन्द में पल्मोनरी शिराये एक छिद्र द्वारा खुलती हैं। अलिन्द की दीवार निलय की अपेक्षा पतली होती है। अलिन्द, अलिन्य-निलय छिद्र द्वारा निलय में खुलते हैं। दाहिने अलिन्द निलय छिद्र पर विवलन कपाट तथा बायें अलिन्य निलय कपाट पर द्विवलन कपाट होता है। कपाट बद रज्जुओं द्वारा निलय की भित्ति पर स्थित पेशी स्तम्भों से जुड़े रहते हैं। ये रक्त को विपरीत दिशा में जाने से रोकते हैं।

दाहिने निलय के अग्र बायें भाग से पल्मोनरी चाप तथा बायें निलय के अम्र दाहिने भाग से कैरोटिको-सिस्टेमिक चाप निकलती है। इनके आधार पर तीन-तीन अर्द्धचन्द्राकार कपाट होते हैं जो रक्त को वापस आने से रोकते हैं।

हृदय की क्रिया-विधि– वाहिने अलिन्द में शिरा अलिन्द पुण्डी होती है। अन्तरा अलिन्द पट के आधारीय भाग में अलिन्द-निलय घुण्डी होती है। इससे विशिष्ट पेशियों का एक समूह निकलता है, जिसे हिस का समूह कहते हैं। इसकी शाखायें निलय की भित्ति में पेशी तन्तुओं का जाल बनाती हैं। इस जाल को पुरकिन्जे के तन्तु कहते हैं।

हृदय में स्पन्दन शिरा-अलिन्द घुण्डी से प्रारम्भ होता है जिससे पहले दाहिने तथा बाद में बायें अलिन्द में संकुचन होता है। इसके फलस्वरूप अलिन्द- निलय पुण्डी में उद्दीपन होता है। यह उद्दीपन हिस के समूह (bundle of His) द्वारा पुरकिन्जे तन्तुओं (Purkinje Fibres) में पहुँचता है। इसके फलस्वरूप दोनों निलयों में एक साथ संकुचन होता है। इस प्रकार मनुष्य (स्तनियों) के हृदय में अलिन्द और निलय के एकान्तर क्रम से संकुचन एवं शिथिलन होने से रक्त का परिसंचरण होता है।

दोहरा रक्त परिसंचरण- पक्षियों तथा स्तनियों में हृदय चार वेश्मों से बना होता है। इसके फलस्वरूप शुद्ध तथा अशुद्ध रक्त पृथक् रहता है। शरीर के विभित्र भागों से अशुद्ध रक्त दायें अलिन्द में आता है और निलय द्वारा इसे फेफड़ों में शुद्ध होने के लिए भेज दिया जाता है। दायें भाग को पल्मोनरी हृदय कहते हैं। हृदय के बायें अलिन्द में फेफड़ों से शुद्ध रक्त आता है और इसे बाये निलय द्वारा शरीर के विभित्र भागों में पम्म कर दिया जाता है।बायें भाग के सिस्टेमिक हृदय कहते हैं। दोहरे परिसंचरण में रक्त प्रवाह प्रभाची बना रहता है। शरीर के विभित्र भागों को O2 आपूर्ति प्रभावी ढंग से होती रहती है। शुद्ध तथा अशुद्ध रक्त अलग-अलग रहते हैं।

प्रश्न 6. उत्सर्जन किसे कहते हैं? मनुष्य के वृक्क की क्रियाविधि को नामांकित चित्र की सहायता से स्पष्ट कीजिए।

अथवा मनुष्य के वृक्क की नामांकित चित्रों सहित संरचना, कार्य तथा मूत्र-निर्माण की क्रियाविधि समझाइए।

अथवा वृक्क में वृक्काणु की संरचना का वर्णन कीजिए। यह कैसे कार्य करता है?

उत्तर-  वृक्काणु (वृक्क नलिका या नेफ्रॉन) (Uriniferous Tubule or Nephron) की संरचना- वृक्क का निर्माण असंख्य सूक्ष्म कुण्डलित वृक्क नलिकाओं से होता है। वृक्क नलिका के दो भाग होते होते हैं 1. मैल्पीघी कोष– मैल्पीमी कोष में प्यालीनुमा संरचना बोमैन सम्पुट (Bowman’s Capsule) तथा रक्त केशिकाओं का गुच्चा ग्लोमेरुलस (glomerulus) होता है। ग्लोमेरुलस में अभिवालों धमनिका रक्त पहुँचाती है और अपवाही धमनिका ग्लोमेरुलस से रक्त वापस ले जाती है।

  1. स्रावी नलिका- स्रावी नलिका के तीन भाग होते हैं-

(i) प्रथम समीपस्थ कुण्डलित भाग,

(ii) मध्य का हेन्ले लूप (Henle’s loop), तथा

(iii) अन्तिम दूरस्थ कुण्डलित भाग। अन्तिम कुण्डलित भाग संग्रह नलिका (collecting tubule) में खुलता है। संग्रह नलिकायें पिरामिड्स पर खुलती हैं।

मूत्र-निर्माण की क्रियाविधि- बोमैन सम्पुट में स्थित ग्लोमेरुलस (glomerulus) में रक्त लाने वाली अपवाही धमनिका रक्त ले जाने वाल अभिवाही धमनिका से चौड़ी होती है इसलिए जितना रक्त ग्लोमेरुलस में आत है, उतना निकल नहीं पाता है। इससे रक्त पर दबाव बढ़ जाता है। इस दबाव के कारण रक्त का तरल भाग छनकर बोमैन सम्पुट में आ जाता है। इसे नेफ़ीक

फिल्ट्रेट कहते हैं। ग्लोमेरुलस से निकलने वाली अभिवाही धमनिका स्रावी नलिका के मध्य भाग हेन्ले लूप (Henle’s Loop) के चारों ओर एक परिनलिका केशिका जालक (peritubular capillary plexus) बनाती है। इस जालक की केशिकायें परस्पर मिलकर वृक्क शिराका (venule) बनाती हैं। शिराकायें परस्पर मिलकर वृक्क शिरा (renal vein) बनाती हैं।

बोमैन सम्पुट में छने तरल में से लाभदायक पदार्थ रक्त केशिकाओं द्वारा पुनः अवशोषित कर लिए जाते हैं और रक्त केशिकाओं में उत्सर्जी पदार्थ स्स्रावी नलिका से स्स्रावित कर दिये जाते हैं। संग्रह नलिका में पहुँचने वाला तरल ‘मूत्र’ (urine) कहलाता है।

प्रश्न 7. कोशिकीय श्वसन को परिभाषित कीजिए तथा उसकी रूपरेखा का चित्र बनाइए।

उत्तर- कोशिकीय श्वसन-यह एक महत्त्वपूर्ण जैविक प्रक्रिया है। श्वसन प्रत्येक सजीव कोशिका में होने वाली एक अपचय प्रक्रिया है। इसमें जटिल कार्बनिक पदार्थों का जैव रासायनिक ऑक्सीकरण होता है और ऊर्जा मुक्त होती है। मुक्त ऊर्जा ATP में गतिज ऊर्जा के रूप में संचित हो जाती है। ATP में संचित गतिज ऊर्जा जैविक क्रियाओं के काम आती है, जैसे संश्लेषण, परिवहन, स्रावण, गति, कोशिका-निर्माण आदि।

C6H12O6+6O2 → 6CO2+6H2O + 673K cal

कोशिकीय श्वसन को मुख्यतया दो भागों में बाँट लेते हैं-

  1. ग्लाइकोलिसिस (Glycolysis), तथा
  2. क्रेब्स चक्र (Kreb’s cycle)।

1.ग्लाइकोलिसिस (Glycolysis)- यह क्रिया कोशाद्रव्य में सम्पन्न होती है। इस क्रिया में ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती। इस क्रिया में ग्लूकोस के एक अणु से पाइरुविक अम्ल के दो अणु बनते हैं। ग्लूकोस में मंचित ऊर्जा का लगभग 96% भाग पाइरुविक अम्ल में संचित हो जाता है। मुक्त ऊर्जा में से कुछ ATP के रूप में संचित हो जाती है, शेष ताप के रूप में बदलकर वातावरण में मुक्त हो जाती है।

2. क्रेब्स चक्र (Kreb’s Cycle)-यह माइटोकॉण्ड्यिा के मैट्रिक्स में एन्जाइम्स की सहायता से होती है। इसमें ऑक्सीजन का उपयोग होता है। इसमें पाइरुविक अम्ल से पहले ‘ऐसीटाइल कोएन्जाइम A’ का निर्माण होता है। यह ऑक्जैलोऐसीटिक अम्ल से मिलकर पहले साइट्रिक अम्ल बनाता है। साइट्रिक अम्ल के क्रमिक विघटन से आइ‌सोसाइट्रिक अम्ल, कीटोग्लूटेरिक अम्ल, नक्सीनिक अम्ल, फ्यूमेरिक अम्ल, मैलिक अम्ल और अन्त में ऑक्जैलोऐसीटिक अमल पुनः बन जाता है। साइट्रिक अम्ल के विघटन के फलस्वरूप CO2 तथा परमाणु हाइड्रोजन (2H+) मुक्त होती है। परमाणु हाइड्रोजन से अणु हाइड्रोजन बनते समय इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण के फलस्वरूप मुक्त ऊर्जा ATP में संचित हो जाती है। ऑक्सी श्वसन में ग्लूकोस के एक अणु में 38 ATP अणु प्राप्त होते हैं। प्रणियों में यह ग्लूकोस में संचित ऊर्जा का लगभग 42% होता है।

प्रश्न 8. प्रकाश-संश्लेषण किसे कहते हैं? प्रकाश संश्लेषण की क्रियाविधि का वर्णन कीजिए।

अथवा प्रकाश संश्लेषण की परिभाषा लिखिए। प्रकाश-संश्लेषण में प्रकाशिक तथा अप्रकाशिक अभिक्रियाओं का वर्णन कीजिए।

अथवा प्रकाश-संश्लेषण की परिभाषा लिखिए। प्रकाश-संश्लेषण की प्रकाशिक अभिक्रिया का वर्णन कीजिए।

उत्तर- प्रकाश-संश्लेषण- पौधे पर्णहरिम तथा सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में CO2 तथा जल से भोज्य पदार्थों का निर्माण करते हैं। इस क्रिया को प्रकाश-संश्लेषण कहते हैं। इस क्रिया में जल का प्रकाशिक ऑक्सीकरण तथा CO2 का अप्रकाशिक अवकरण होता है। कार्बनिक यौगिक बनते हैं और 02 मुक्त होती है।

6CO₂ + 12H₂O → C6H12O6 + 6H₂O +602

प्रकाश-संश्लेषण की क्रियाविधि प्रकाश संश्लेषण की क्रिया दो प्रावस्थाओं में पूर्ण होती है-

(क) प्रकाश अभिक्रिया या हिल अभिक्रिया, तथा (ख) अप्रकाशिक अभिक्रिया या केल्विन चक्र।

(क) प्रकाश अभिक्रिया- यह क्रिया प्रकाश की उपस्थिति में हरितलवक के ग्रेनम में होती है। प्रकाश अभिक्रिया में प्रकाश ऊर्जा का रूपान्तरण रासायनिक ऊर्जा में हो जाता है। यह ऊर्जा ATP में संचित हो जाती है। इस क्रिया को फोटोफॉस्फोरिलेशन कहते हैं। प्रकाश अवशोषित करके पर्णहरिम ऊर्जान्वित हो जाते हैं। इसमें उच्च ऊर्जा इलेक्ट्रॉन मुक्त होता है। हरितलवक में अनेक इलेक्ट्रॉनग्राही होते हैं, इनके माध्यम से ऊर्जान्वित क्लोरोफिल अपनी मूल अवस्था में चक्रीय तथा अचक्रीय फोटोफॉस्फोरिलेशन द्वारा आ जाता है।

(i) प्रकाश अभिक्रिया में ऊर्जान्वित पर्णहरिम के कारण जल हाइड्रोजन (H+) तथा हाइड्रॉक्सिल (OH) आयनों में टूट जाता है। इस क्रिया को प्रकाशिक अपघटन कहते हैं।

(ii) जल-अपघटन से मुक्त हाइड्रोजन (H’) को हाइड्रोजनग्राही (NADP) ग्रहण कर लेते हैं। हाइड्रोजनग्राही (NADP) H’ को ग्रहण करके NADP.H, में अपचयित हो जाता है। यह एक अपचायक की तरह कार्य करने लगता है।

24H+ +12NADP+24e → 12NADP.H2

NADP.H2 का प्रयोग अप्रकाशिक अभिक्रिया में होता है। इसमें ऊर्जान्वित पर्णहरिम से मुक्त उच्च ऊर्जा इलेक्ट्रॉन (2) प्रयुक्त हो जाते हैं।

(iii) जल-अपघटन से बने हाइड्रॉक्सिल आयन (OH) परस्पर क्रिया करके जल तथा O2 बनाते हैं। इस क्रिया में मुक्त इलेक्ट्रॉन (2e) ऊर्जान्वित पर्णहरिम अणु को उसकी मूल दशा में वापस ले आते हैं।

 (ख) अप्रकाशिक अभिक्रिया-यह क्रिया प्रकाश अभिक्रिया के साथ-साथ हरितलवक के स्ट्रोमा में होती है। इसमें ATP तथा NADP.H द्वारा CO, का अपचयन होता है और ग्लूकोस का निर्माण होता है। यह क्रिया निम्न चरणों में पूरी होती है-

(i) CO2 कोशिकाओं में पहुँचकर रिबुलोज बाइफॉस्फेट (RuBP) से क्रिया करके फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल के दो अणु का निर्माण करता।

CO2+RuBP → 2PGA

(ii) फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल ATP से क्रिया करके 1-3 डाइफॉस्फोग्लिसरिक अम्ल तथा ADP बनाता है।

PGA+ATP1-3, DiPGA+ ADP

(iii) 1-3 डाइफॉस्फोग्लिसरिक अम्ल NADP.H, से क्रिया करके 3- फॉस्फोग्लिसरेल्डिहाइड (3 PGAL) में अपचयित हो जाता है।

1-3 DIPGA + NADP.H2→ 3PGAL + NADP+H3PO4

(iv) अधिकांश PGAL अणु कोशिका में उपस्थित फॉस्फेट मूलक से क्रिया करके पुनः RuBP में बदल जाते हैं ताकि यह पुनः CO2 से क्रिया कर सके।

(v) शेष PGAL के दो अणु परस्पर मिलकर फ्रक्टोस डाइफॉस्फेट शर्करा बनाते हैं। यह अनेक परिवर्तनों के फलस्वरूप ग्लूकोस में बदल जाता है।

PGAL→ फ्रक्टोस डाइफॉस्फेट→ ग्लुकोस

प्रश्न 9. रन्ध कहाँ पाये जाते हैं? इनकी संरचना तथा कार्य का सचित्र वर्णन कीजिए।

अथवा पर्णरन्ध की क्रियाविधि को बन्द और खुले छिद्र का चित्रांकन पर प्रदर्शित कीजिए। (2012)

अथवा रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन क्रियाविधि का सचित्र वर्णन कीजिए।

उत्तर- रन्ध्र-पौधे के हरे वायवीय भागों में रन्ध्र पाये जाते हैं। पत्तियों की सतह पर रन्ध्रों की संख्या औसतन 250 से 300 प्रति mm² होती है। यह संख्या न्यूनतम 14 और अधिकतम 1038 mm² हो सकती है। रन्त्र पत्ती की सतह का औसतन 1-2 प्रतिशत क्षेत्र घेरते हैं।

रन्ध्र की संरचना- रन्ध्र रक्षक या द्वार कोशिकाओं से घिरे रहते हैं। द्वार कोशिकाएँ सहायक या अधिचर्म कोशिकाओं से घिरी रहती हैं। द्वार कोशिकाएँ रन्ध्र के खुलने तथा बन्द होने की क्रिया पर नियन्त्रण रखती है। द्वार कोशिकाओं की भीतरी भित्ति स्थूलित तथा बाह्य भित्ति पतली होती है। द्वार कोशिकाओं में हरितलवक पाये जाते हैं। रन्ध्रों के नीचे एक छोटी-सी अधोरन्ध्री गुहा होती है। द्वार कोशिकाओं के स्फीत होने पर रन्ध्र खुल जाते हैं और श्लथ होने पर बन्द हो जाते हैं। रन्ध्र प्रायः दिन में खुले रहते हैं और रात में बन्द हो जाते हैं।

रन्ध्र पृष्ठाधारी पत्तियों की निचली सतह पर सामान्यतया अधिक संख्या में पाये जाते हैं। समद्विपार्वीय पत्तियों की दोनों सतहों पर रन्ध्रों की संख्या लगभग समान होती है। मरुद्भिद् पौधों में रन्ध्र प्रायः गड्‌ढ़ों में भैंसे रहते हैं। इसके फलस्वरूप वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है-जैसे कनेर, चीड़, धीग्वार आदि।

स्टार्च-शर्करा परिवर्तन मत– सेयरे (Sayre, 1972) के अनुसार रक्षक कोशिकाओं के pH मान में परिवर्तन होने से रन्ध्र खुलते और बन्द होते हैं। दिन के समय pH मान अधिक होता है। प्रकाश-संश्लेषण के फलस्वरूप बना ग्लूकोस ATP के फॉस्फेट से क्रिया करके ग्लूकोस-1-फॉस्फेट बनाता है तथा रक्षक कोशिकाओं का स्टार्च फॉस्फोरिलेज एन्जाइम के कारण अकार्बनिक फॉस्फेट से क्रिया करके ग्लूकोस-1-फॉस्फेट में बदल जाता है। इसके फलस्वरूप रक्षक कोशिकाओं की सान्द्रता बढ़ जाती है। अंतः परासरण (endosmosis) के फलस्वरूप रक्षक कोशिकायें स्फीत हो जाती हैं और रन्ध्र खुल जाते हैं।

रात्रि में pH मान कम होने के कारण फॉस्फोरिलेज एन्जाइम ग्लूकोस-1. फॉस्फेट को अघुलनशील स्टार्च में बदल देता है। सान्द्रता कम हो जाने से बहिः परासरण के कारण रक्षक कोशिकायें श्लथ दशा में आ जाती हैं और रन्ध्र बन्द हो जाते हैं।

रन्धों के कार्य-

  1. रन्ध्रों द्वारा CO2 तथा 02 का आदान-प्रदान होता है।
  2. रन्ध्रों द्वारा वाष्पोत्सर्जन होत होता है।
  3. रन्ध्रों की संख्या तथा स्थिति वाष्पोत्सर्जन की दर को नियन्त्रित करती है।

प्रश्न 10. विटामिन्स क्या हैं? इसके प्रमुख प्रकार तथा मानव जीवन में इनके महत्त्व का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।

उत्तर- विटामिन्स- ये जटिल कार्बनिक यौगिक हैं। ये उपापचय क्रियाओं का नियमन तथा नियन्त्रण करते हैं। इनकी कमी से अनेक अपूर्णता रोग हो जाते हैं। इसी कारण विटामिन्स को वृद्धिकारक तत्त्व भी कहते हैं। जन्तु विटामिन्स को भोजन द्वारा प्राप्त करते हैं। सर्वप्रथम लूनिन (Lunin, 1881) ने भोजन में इन अज्ञात तत्त्वों का पता लगाया था। ईज्कमान (Izkman, 1899) ने बताया कि बेरी-बेरी रोग पॉलिश वाले चावल खाने से होता है। फुंक (Funk, 1912) ने सर्वप्रथम विटामिन शब्द का प्रयोग किया था। हॉकिन्स तथा फुंक (1912) ने विटामिन मत प्रस्तुत किया। विटामिन्स का शरीर में संचय नहीं होता है अतः इनकी नियमित आपूर्ति आवश्यक है। विटामिन्स को दो समूहों में वर्गीकृत करते हैं-

(i) जल में घुलनशील विटामिन-विटामिन B तथा C

(ii) वसा में घुलनशील विटामिन-विटामिन A, D, E तथा K

मानव जीवन में विटामिन्स का महत्त्व

विटामिनों की मानव शरीर में अलग-अलग भूमिका होती है। विटामिन भोजन के अवयव हैं जिनकी सभी जीवों को अल्प मात्रा में आवश्यकता होती है। रासायनिक रूप से ये कार्बनिक यौगिक होते हैं। ये शरीर द्वारा पर्याप्त मात्रा में स्वयं उत्पन्न नहीं किए जा सकते हैं बल्कि भोजन के रूप में प्राप्त होते हैं। विटामिन शरीर की विभिन्न रोगों से सुरक्षा प्रदान करते हैं तथा शरीर को रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करते हैं। ये शरीर में उत्प्रेरक की भाँति कार्य करते हैं। और विभिन्न शारीरिक क्रियाओं को सम्पन्न करने में सहयोग देते हैं। विटामिन को जीवन सत्व भी कहते हैं।

 

UP Board and NCERT Solution of Class 10 Science Chapter- 5 Life Processes ( जैव प्रक्रम ) Notes in hindi

 

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