UP Board Solution of Class 9 Hindi Padya Chapter 9 – Path ki Pehchan- पथ की पहचान (हरिवंशराय बच्चन) Jivan Parichay, Padyansh Adharit Prashn Uttar Summary

UP Board Solution of Class 9 Hindi Padya Chapter 9 – Path ki Pehchan- पथ की पहचान (हरिवंशराय बच्चन) Jivan Parichay, Padyansh Adharit Prashn Uttar Summary

Dear Students! यहाँ पर हम आपको कक्षा 9 हिंदी पद्य खण्ड के पाठ 9  पथ की पहचान का सम्पूर्ण हल प्रदान कर रहे हैं। यहाँ पर पथ की पहचान सम्पूर्ण पाठ के साथ हरिवंशराय बच्चन का जीवन परिचय एवं कृतियाँ,द्यांश आधारित प्रश्नोत्तर अर्थात पद्यांशो का हल, अभ्यास प्रश्न का हल दिया जा रहा है।

Dear students! Here we are providing you complete solution of Class 9 Hindi  Poetry Section Chapter Path ki Pehchan. Here the complete text, biography and works of  Harivansh Rai Bachchan along with solution of Poetry based quiz i.e. Poetry and practice questions are being given. 

UP Board Solution of Class 9 Hindi Gadya Chapter 1 - Baat - बात (प्रतापनारायण मिश्र) Jivan Parichay, Gadyansh Adharit Prashn Uttar Summary

Chapter Name Path ki Pehchan- पथ की पहचान (हरिवंशराय बच्चन) Harivansh Rai Bachchan
Class 9th
Board Nam UP Board (UPMSP)
Topic Name जीवन परिचय,पद्यांश आधारित प्रश्नोत्तर,पद्यांशो का हल (Jivan Parichay, Padyansh Adharit Prashn Uttar Summary)

जीवन परिचय

हरिवंशराय बच्चन

स्मरणीय तथ्य

जन्म सन् 1907 ई०, प्रयाग।
मृत्यु सन् 2003 ई०।
शिक्षा एम० ए०, पी-एच० डी०।
पिता का नाम प्रताप नारायण।
रचनाएँ मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश, निशा निमन्त्रण, एकान्त संगीत, सतरंगिणी, हलाहल, बंगाल का काल, मिलन- यामिनी, प्रणय-पत्रिका, बुद्ध और नाचघर (काव्य), क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड़ का निर्माण फिर (आत्मकथा), दो चट्टानें।

काव्यगत विशेषताएँ

वर्ण्य-विषय प्रेम के संयोग-वियोग जन्य भावों का चित्रण, विषाद और निराशा का चित्रण, विद्रोह का स्वर, युग जीवन का व्यापक चित्रण।
भाषा सहज व सरल खड़ीबोली।
शैली गीतात्मक।
छन्द मुक्तक।

जीवन-परिचय

श्री हरिवंशराय बच्चन का जन्म प्रयाग में सन् 1907 ई० में हुआ। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा उर्दू भाषा के माध्यम से हुई थी। आपने सन् 1925 ई० में कायस्थ पाठशाला, इलाहाबाद से हाईस्कूल, सन् 1927 ई० में गवर्नमेण्ट इन्टर कालेज से इण्टर तथा सन् 1929 ई० में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की। असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के कारण आपने विश्वविद्यालय छोड़ दिया। बाद में सन् 1938 ई० में उसी विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की। सन् 1954 ई० में आपने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पी-एच० डी० की उपाधि प्राप्त की। आरम्भ में आपने प्रयाग विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में कार्य किया। कुछ समय तक आपने आकाशवाणी में काम किया। तत्पश्चात् आपकी नियुक्ति भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिन्दी विशेषज्ञ के पद पर हुई और वहीं से अवकाश ग्रहण किया। आप सन् 1965 ई० में राज्यसभा के सदस्य मनोनीत हुए।

साहित्य और कविता के प्रति आपकी रुचि बचपन से ही थी। सन् 1933 ई० में आपकी रचना ‘मधुशाला’ के प्रकाशन ने आपको कीर्ति के शिखर पर पहुँचा दिया। आपकी साहित्यिक सेवाओं के लिए सन् 1976 ई० में भारत सरकार द्वारा उन्हें ‘पद्म भूषण’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। आपका शरीरान्त सन् 2003 ई० में हो गया।

रचनाएँ

बच्चन जी की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं- मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश, निशा निमंत्रण, प्रणय-पत्रिका, एकांत संगीत, मिलन यामिनी, सतरंगिणी, दो चट्टानें आदि। ‘दो चट्टानें’ काव्य-ग्रन्थ के लिए आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया है।

 

पथ की पहचान

पूर्व चलने के बटोही,

बाट की पहचान कर ले।

(1)

पुस्तकों में है नहीं

छापी गयी इसकी कहानी,

हाल इसका ज्ञात होता है

न औरों की जबानी,

अनगिनत राही गये इस

राह से, उनका पता क्या,

पर गये कुछ लोग इस पर

छोड़ पैरों की इस निशानी,

यह निशानी मूक होकर

भी बहुत कुछ बोलती है,

खोल इसका अर्थ, पंथी,

पंथ का अनुमान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही

बाट की पहचान, कर ले।

सन्दर्भ- यह पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी काव्य’ में हरिवंशराय बच्चन की कविता ‘पथ की पहचान’ से उद्धृत है।

व्याख्या- कवि कहता है कि हमारे जीवन-पथ की कहानी पुस्तकों में नहीं लिखी होती है, वह तो हमें स्वयं ही बनानी पड़ती है, दूसरे लोगों के कथन के अनुसार भी हम अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित नहीं कर सकते। इसका निर्धारण हमें स्वयं ही करना पड़ेगा। इस संसार में अनेक लोग पैदा हुए और मर गये। उन सबकी गणना नहीं की जा सकती, परन्तु कुछ ऐसे कर्मवीर भी यहाँ जन्मे हैं जिनके पदचिह्न मौन भाषा में उनके महान् कार्यों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हैं। उन सभी कर्मठ महापुरुषों ने काम करने से पहले खूब सोच-विचार किया और फिर जी-जान से अपने कार्य में जुटकर सफलता प्राप्त की। अतः हे राहगीर, उनसे प्रेरणा ग्रहण कर अपना मार्ग निश्चित कर ले और तब उस पर चलना शुरू कर ।

काव्यगत सौन्दर्य

भाषा – सरल तथा खड़ीबोली।

शैली- गीत शैली।

रस – शान्त।

अलंकार – विरोधाभास।

 

(2)

यह बुरा है या कि अच्छा,

व्यर्थ दिन इस पर विताना

अब असंभव, छाड़ यह पथ

दूसरे पर पग बढ़ाना,

तू इसे अच्छा समझ,

यात्रा सरल इससे बनेगी,

सोच मत केवल तुझे ही

यह पड़ा मन में बिठाना,

हर सफल पंथी, यही

विश्वास ले इस पर बढ़ा है,

तू इसी पर आज अपने

चित्त का अवधान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही,

बाट की पहचान कर ले।

सन्दर्भ- पूर्ववत्

व्याख्या- कवि कहता है कि विवेकपूर्ण कार्य का चुनाव करने के पश्चात उसकी अच्छाई-बुराई पर सोचना व्यर्थ है- क्योंकि उस पथ को छोड़कर दूसरे पर चलना भी सम्भव नहीं हो सकेगा। कठिनाइयाँ तो हर मार्ग में होती हैं। इसलिए हे पंथी, अपने निश्चित कार्य को श्रेष्ठ समझकर उसे तुरन्त शुरू कर दे। यह कार्य करते समय तुझे आनन्द की अनुभूति होती रहेगी। ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि कठिनाइयाँ तुझे ही उठानी पड़ रही हैं। वास्तविकता यह है कि जीवन में जिसे भी सफलता मिली है, वह अपने कार्य को श्रेष्ठ समझता रहा है। इसलिए तुम भी अपने कार्य को श्रेष्ठ समझो। सोच-विचार करना है तो कार्य का चुनाव करने से पहले किया करो।

काव्यगत सौन्दर्य

भाषा – सरल- सुबोध खड़ीबोली।

शैली – प्रवाहपूर्ण गीत शैली।

रस – शान्त ।

शब्द-शक्ति- लक्षणा।

अलंकार – अनुप्रास ।

 

     (3)

है अनिश्चित किस जगह पर

सरित, गिरि, गहर मिलेंगे,

है अनिश्चित, किस जगह पर

बाग, बन सुन्दर मिलेंगे।

किस जगह यात्रा खतम हो

जायगी, यह भी अनिश्चित,

है, अनिश्चित, कब सुमन, कब

कंटकों के शर मिलेंगे,

कौन सहसा छूट जायेंगे,

मिलेंगे कौन सहसा

आ पड़े कुछ भी, रुकेगा

तू न, ऐसी आन कर ले।

पूर्व चलने के बटोही,

बाट की पहचान कर ले।

सन्दर्भ- पूर्ववत्

व्याख्या- कवि कहता है कि हे जीवन-पथ के मुसाफिर! यह नहीं बताया जा सकता है कि तेरे मार्ग में किस स्थान पर नदी, पर्वत और गुफाएँ मिलेंगी। तेरे मार्ग में कब कठिनाइयाँ और बाधाएँ आयेंगी, यह नहीं कहा जा सकता। यह भी नहीं कहा जा सकता कि तेरे जीवन के मार्ग में किस स्थान पर सुन्दर वन और उपवन मिलेंगे। तेरे जीवन में कब सुख-सुविधाएँ प्राप्त होंगी। यह भी निश्चित नहीं कहा जा सकता कि कब तेरी जीवन-यात्रा समाप्त होगी और कब तेरी मृत्यु होगी।

कवि आगे कहता है कि यह बात भी अनिश्चित है कि मार्ग में कब तुझे फूल मिलेंगे और कब काँटे तुझे घायल करेंगे। तेरे जीवन में कब सुख प्राप्त होगा और कब दुःख-यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। यह भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है कि तेरे जीवन-मार्ग में कौन परिचित व्यक्ति मिलेंगे और कौन प्रियजन अचानक तुझे छोड़ जायेंगे। हे पथिक ! तू अपने मन में प्रण कर ले कि जीवन की कठिनाइयों की परवाह न करके तुझे आगे बढ़ते जाना है।

हे जीवन-पथ के यात्री ! तू पथ पर चलने से पूर्व जीवन में आनेवाले सुख-दुःख को भली-भाँति जानकर अपने मार्ग की पहचान कर ले।

काव्यगत सौन्दर्य

भाषा – सरल खड़ी बोली।

शैली – प्रतीकात्मक, वर्णनात्मक।

रस – शान्त ।

शब्दशक्ति – लक्षणा ।

अलंकार – अनुप्रास, रूपक।

 

     (4)

कौन कहता है कि स्वप्नों

को न आने दे हृदय में,

देखते सब हैं इन्हें

अपना उमर, अपने समय में,

और तू कर यत्न भी तो

मिल नहीं सकती सफलता,

ये उदय होते, लिए कुछ

ध्येय नयनों के निलय में,

किन्तु जग के पंथ पर यदि

स्वप्न दो तो सत्य दो सौ,

स्वप्न पर ही मुग्ध मत हो,

सत्य का भी ज्ञान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही,

बाट की पहचान कर ले।

सन्दर्भ- पूर्ववत्

व्याख्या- हे पथिक ! तुमसे ऐसा किसी ने नहीं कहा है कि तुम अपने मन में स्वप्नों अर्थात् मधुर कल्पनाओं को न लगाओ। सब लोगों की अपनी-अपनी स्वप्निल कल्पनाएँ होती हैं। अपनी-अपनी उम्र और अपने-अपने समय में सभी ने इन्हें देखा है और अपने मन में उन्हें जगह दी है। हे पथिक ! तू प्रयत्न करने पर भी इसमें सफल नहीं हो सकता कि तेरी कल्पनाएँ मन में न उठें। ये स्वप्न, ये कल्पनाएँ व्यर्थ नहीं होतीं, इनका भी अपना लक्ष्य या ध्येय होता है। ये स्वप्न जब आँखों के नीड़ में उपजते हैं, तब उनका अपना ध्येय होता है, ये व्यर्थ नहीं जाते, किन्तु स्वप्नों से यथार्थ को झुठलाया नहीं जा सकता। कारण यह है कि स्वप्न या कल्पनाएँ जीवन में बहुत कम हैं, उनके सामने यथार्थ सत्य अनगिनत हैं। सत्य का मुकाबला कल्पनाओं से मत करो। संसार के रास्ते में यदि स्वप्न दो हैं, तो सत्य दो-सौ अर्थात् कल्पनाएँ बहुत कम हैं, यथार्थ बहुत अधिक हैं। अतः यह आवश्यक हो जाता है कि तुम कल्पनाओं पर ही मत रीझते रहो वरन् सत्य क्या है- इसका भी निर्धारण कर लो। हे पथिक ! चलने से पहले अपने रास्ते की पहचान कर लो।

काव्यगत सौन्दर्य

भाषा – साहित्यिक हिन्दी।

रस – शान्त।

गुण – प्रसाद।

अलंकार – रूपक तथा अनुप्रास ।

                        (5)

स्वप्न आता स्वर्ग का, दृग-

कोरकों में दीप्ति आती,

पंख लग जाते पगों को,

ललकती उन्मुक्त छाती,

रास्ते का एक काँटा

पाँव का दिल चीर देता,

रक्त की दो बूंद गिरतीं,

एक दुनिया डूब जाती,

आँख में हो स्वर्ग लेकिन

पाँव पृथ्वी पर टिके हों,

कंटकों की इस अनोखी

सीख का सम्मान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही,

बाट की पहचान कर ले।

(बच्चन : सतरंगिणीसे)

सन्दर्भ- पूर्ववत्

व्याख्या- हे पथिक ! भावुकता के आवेश में आकर किसी मार्ग पर अग्रसर होने से पूर्व हम स्वर्ग का सपना देखने लगते हैं। प्रसन्नता के कारण हमारी आँखें चमक उठती हैं। उस समय कल्पना लोक की उड़ान भरने के लिए हमारे पैरों में पंख लग जाते हैं। छाती उन्मुक्त हो उत्साह से भर जाती है। किन्तु ठीक उसी प्रकार राह का एक मामूली सा काँटा पाँवों में चुभ जाता है और खून की दो बूँदों के बहने से ही सारी कल्पना की दुनिया ही उसमें डूब जाती है अर्थात् मार्ग में मामूली अवरोध उत्पन्न हो जाने मात्र से ही सारा मजा किरकिरा हो जाता है। अतः पाँवों के काँटे चुभकर ये शिक्षा देते हैं कि भले ही तुम्हारी आँखों में स्वर्ण के सजीले सपने क्यों न हों किन्तु तुम्हें अपने पैरों को पृथ्वी पर सुरक्षित टिकाना चाहिए अर्थात् मस्तिष्क में भले ही कल्पना की ऊँची उड़ाने क्यों न हों, किन्तु आवहारिक जगत् की उपयोगिता कदापि भूलनी नहीं चाहिए। हमें पथ के चुभे काँटों की इस शिक्षा का सदैव सम्मान करना चाहिए। किसी मार्ग पर अग्रसर होने से पूर्व उस मार्ग की पूरी जानकारी अवश्य कर लेनी चाहिए।

 

  • निम्नलिखित पद्यांशों पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

पुस्तकों में है नहीं

छापी गई इसकी कहानी,

हाल इसका ज्ञात होता

है न औरों की जवानी,

अनगिनत राही गये इस

राह से, उनका पता क्या,

पर गये कुछ लोग इस पर

छोड़ पैरों की निशानी,

यह निशानी मूक होकर

भी बहुत कुछ बोलती है,

खोल इसका अर्थ, पंथी,

पंथ का अनुमान कर ले।

पूर्व चलने का बटोही,

बाट की पहचान कर ले।

प्रश्न- (i) कवि राहगीर को किससे प्रेरणा लेने की बात कह रहा है?

उत्तर- कवि राहगीर को कर्मठ महापुरुषों से प्रेरणा लेने की बात कह रहा है।

(ii) कविता के अनुसार किन लोगों ने जीवन में सफलता प्राप्त की?

उत्तर- जीवन में उन कर्मठ महापुरुषों को सफलता मिली जिन्होंने खूब सोच-समझकर कार्य किया।

(iii) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

उत्तर- कवि का नाम हरिवंश राय बच्चन है और कविता का नाम ‘पथ की पहचान’ है।

 

  • यह बुरा है या कि अच्छा,

व्यर्थ दिन इस पर बिताना

अब असंभव, छोड़ यह पथ

दूसरे पर पग बढ़ाना,

तू इसे अच्छा समझ,

यात्रा सरल इससे बनेगी,

सोच मत केवल तुझे ही

यह पड़ा मन में बिठाना,

हर सफल पंथी, यही

विश्वास ले इस पर बढ़ा है,

तू इसी पर आज अपने

चित्त का अवधान कर ले।

पूर्व चलने के, बटोही,

बाट की पहचान कर ले।

प्रश्न- (i) उपर्युक्त पद्यांश में कवि व्यक्ति को क्या प्रेरणा दे रहा है?

उत्तर- कवि व्यक्ति को चुने हुए कार्य में तन-मन से जुट जाने की प्रेरणा देता है।

(ii) जीवन में सफलता किसे प्राप्त होती है?

उत्तर- जो आदमी अपने कार्य को श्रेष्ठ समझता है, उसे जीवन में सफलता मिलती है।

(iii) विवेकपूर्ण कार्य का चुनाव करने के पश्चात् उसकी अच्छाई-बुराई पर सोचना क्यों व्यर्थ है?

उत्तर- विवेकपूर्ण कार्य का चयन करने के बाद उसकी अच्छाई-बुराई पर सोचना व्यर्थ है- क्योंकि उस पथ को छोड़कर दूसरे पथ चलना भी सम्भव नहीं हो सकेगा। कठिनाइयाँ तो हर मार्ग में होती हैं।

 

  • कौन कहता है कि स्वप्नों

को न आने दे हृदय में,

देखते सब हैं इन्हें

अपना उमर, अपने समय में,

और तू कर यत्न भी तो

मिल नहीं सकती सफलता,

ये उदय होते, लिए कुछ

ध्येय नयनों के निलय में,

किन्तु जग के पंथ पर यदि

स्वप्न दो तो सत्य दो सौ,

स्वप्न पर ही मुग्ध मत हो,

सत्य का भी ज्ञान कर ले।

प्रश्न- (i)उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

उत्तर- प्रस्तुत पद्यांश के कवि हरिवंश राय बच्चन हैं और कविता का नाम है – ‘पथ की पहचान’।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में कवि क्या सन्देश दे रहा है?

उत्तर- उपरोक्त पंक्तियों में कवि सन्देश दे रहा है कि कल्पनाओं में मत जिओ। कर्मठ एवं दृढ़निश्चयी बनो।

(iii) प्रस्तुत पंक्तियों में कौन अलंकार प्रयुक्त हुए हैं?

उत्तर- प्रस्तुत पद्यावतरण में रूपक तथा अनुप्रास अलंकार प्रयुक्त हैं।

 

 

UP Board Solution of Class 9 Hindi Padya Chapter 8 – Unhe Pranam- उन्हें प्रणाम(सोहनलाल द्विवेदी) Jivan Parichay, Padyansh Adharit Prashn Uttar Summary – Copy

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