विराम चिह्नों के प्रयोग और नियम – Viram Chinh – Hindee Viram Chihn Niyam Pahchan Bhed Prakar

विराम चिह्नों के प्रयोग और नियम प्रकार अथवा भेद – Viram Chinh – Hindee Viram Chihn Niyam Pahchan Bhed Prakar – पूर्णविराम (Full stop), अल्पविराम (Comma)     – ,योजक चिह्न (Hyphen), प्रश्नवाचक चिह्न (Sign of interrogation), विस्मयादिबोधक चिह्न (Sign of exclamation), उद्धरणचिह्न (Inverted comma)

पूर्णविराम (Full stop), अल्पविराम (Comma)     - ,योजक चिह्न (Hyphen), प्रश्नवाचक चिह्न (Sign of interrogation), विस्मयादिबोधक चिह्न (Sign of exclamation), उद्धरणचिह्न (Inverted comma)

विरामचिह्नों के प्रयोग और नियम

विरामचिह्नों की आवश्यकता – ‘विराम’ का शाब्दिक अर्थ होता है, ठहराव । जीवन की दौड़ में मनुष्य को कहीं-न-कहीं रुकना या ठहरना भी पड़ता है । विराम की आवश्यकता हर व्यक्ति को होती है। जब हम काम करते-करते थक जाते हैं, तब मन आराम करना चाहता है। यह आराम विराम का ही दूसरा नाम है। पहले विराम होता है, फिर आराम। स्पष्ट कि साधारण जीवन में भी विराम की आवश्यकता है।

लेखन मनुष्य के जीवन की एक विशेष मानसिक अवस्था है। लिखते समय लेखक यों ही नहीं दौड़ता, बल्कि कहीं थोड़ी देर के लिए रुकता है, ठहरता है और पूरा (पूर्ण) विराम लेता है। ऐसा इसलिए होता है कि हमारी मानसिक दशा की गति सदा एक जैसी नहीं होती। यही कारण है कि लेखनकार्य में भी विरामचिह्नों का प्रयोग करना पड़ता है।

यदि इन चिह्नों का उपयोग न किया जाए, तो भाव अथवा विचार की स्पष्टता में बाधा पड़ेगी और वाक्य एक-दूसरे से उलझ जाएँगे और तब पाठक को व्यर्थ ही माथापच्ची करनी पड़ेगी। पाठक के भाव वोध को सरल और सुवोध बनाने के लिए विरामचिह्नों का प्रयोग होता है। सारांश यह कि वाक्य के सुंदर गठन और भावाभिव्यक्ति की स्पष्टता के लिए इन विरामचिह्नों की आवश्यकता और उपयोगिता मानी गई है। प्रत्येक विरामचिह्न लेखक की विशेष मनोदशा का एक-एक पड़ाव है, उसके ठहराव का संकेतस्थान है।

हिंदी में प्रयुक्त विरामचिह्न – हिंदी में निम्नलिखित विरामचिह्नों का प्रयोग अधिक होता है-

  • १. पूर्णविराम (Full stop)    – /
  • २. अल्पविराम (Comma)     – ,
  • ३. योजक चिह्न (Hyphen)    – –
  • ४. प्रश्नवाचक चिह्न (Sign of interrogation) – ?
  • ५. विस्मयादिबोधक चिह्न (Sign of exclamation)-!
  • ६. उद्धरणचिह्न (Inverted comma)  – “”
  • ७. पूर्णविराम ( । )

१. पूर्णविराम (Purnviram)

 पूर्णविराम का अर्थ है, पूरी तरह रुकना या ठहरना । सामान्यतः जहाँ वाक्य की गति अंतिम रूप ले ले, विचार के तार एकदम टूट जाएँ, वहाँ पूर्णविराम का प्रयोग होता है। जैसे-

यह हाथी है। वह लड़का है। मैं आदमी हूँ। तुम जा रहे हो ।

इन वाक्यों में सभी एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं। सबके विचार अपने में पूर्ण हैं। ऐसी स्थिति में प्रत्येक वाक्य के अंत में पूर्णविराम लगना चाहिए। संक्षेप में, प्रत्येक वाक्य की

समाप्ति पर पूर्णविराम का प्रयोग होता है।

२. कभी-कभी किसी व्यक्ति या वस्तु का सजीव वर्णन करते समय वाक्यांशों के अंत में पूर्णविराम का प्रयोग होता है। जैसे-

गोरा रंग । गालों पर कश्मीरी सेव की झलक । नाक की सीध में ऊपर के ओठ पर मक्खी की तरह कुछ काले बाल। सिर के बाल न अधिक बड़े, न अधिक छोटे । कानों के पास बालों में कुछ सफेदी । पानीदार बड़ी-बड़ी आँखें। चौड़ा माथा । बाहर बंद गले का लंबा कोट ।

द्रष्टव्य- –यहाँ व्यक्ति की मुखमुद्रा का बड़ा ही सजीव चित्र कुछ चुने हुए शब्दों तथा वाक्यांशों में खींचा गया है। प्रत्येक वाक्यांश अपने में पूर्ण और स्वतंत्र है। ऐसी स्थिति में पूर्णविराम का प्रयोग उचित ही है।

पूर्णविराम का दुष्प्रयोग — पूर्णविराम के प्रयोग में सावधानी न रखने के कारण निम्नलिखित उदाहरण में अल्पविराम लगाया गया है— आप मुझे नहीं जानते, महीने में मैं दो ही दिन व्यस्त रहा हूँ।

द्रष्टव्य – यहाँ ‘जानते’ के बाद अल्पविराम के स्थान पर पूर्णविराम का चिह्न लगाना चाहिए, क्योंकि यहाँ वाक्य पूरा हो गया है। दूसरा वाक्य पहले से विलकुल स्वतंत्र है।

निम्नलिखित उदाहरण में पूर्णविराम के स्थान पर अर्द्धविराम का प्रयोग होना चाहिए-

मैं मनुष्य में मानवता देखना चाहती हूँ। उसे देवता बनाने की मेरी इच्छा नहीं ।

अल्पविराम (, ) {Alpviram}

हिंदी में प्रयुक्त विरामचिह्नों में अल्पविराम का प्रयोग सबसे अधिक होता है। अतएव, इसके प्रयोग के सामान्य नियम जान लेने चाहिए। ‘अल्पविराम’ का अर्थ है थोड़ी देर के लिए रुकना या ठहरना । हर लेखक को अपनी विभिन्न मनोदशाओं से गुजरना पड़ता है। कुछ मनोदशाएँ ऐसी हैं, जहाँ लेखक को अल्पविराम का उपयोग करना पड़ता है। ये अनिवार्य दशाएँ हैं।

कुछ मनोदशाएँ ऐसी जहाँ अल्पविराम का उपयोग वर्जित है। हमें इन्हीं तीन स्थितियों को ध्यान में रखकर अल्पविराम के व्यवहार पर विचार करना चाहिए। अल्पविराम के प्रयोग की निम्नलिखित स्थितियाँ हो सकती हैं—

१. वाक्य में जब दो से अधिक समान पदों, पदांशों अथवा वाक्यों में संयोजक अव्यय ‘और’ की गुंजाइश हो, तब वहाँ अल्पविराम का प्रयोग होता है। जैसे—

पदों में – राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न राजभवन में पधारे।

वाक्यों में – वह रोज आता है, काम करता है और चला जाता है।

इन उदाहरणों में दो से अधिक समान पदों में पार्थक्य दिखाया गया है। कुछ अन्य उदाहरण इस प्रकार हैं–

  •   राम, मोहन, सुरेश और श्याम घर चले गए।
  •   छोटी, हल्की, गोल और किनारदार थाली लाओ।   
  •   उठकर नहाकर और खाकर विनय कॉलेज चला गया।

अँगरेजी में ‘और’ (and) के पहले भी अल्पविराम (, ) का प्रयोग, एक विशेष स्थिति में होता है। इसके लिए नियम यह है कि जब दो बड़े वाक्यांशों (clauses) अथवा दो बड़े पदांशों (phrases) को ‘and’ जोड़ता हो तब ‘and’ के पहले अल्पविराम का प्रयोग किया जाना चाहिए। जैसे

He entered the room, locked the room, and seated himself at the desk.

He shot the landlord, and the barman only escaped by ducking behind the counter.

हिंदी में अँगरेजी के इस विराम-संबंधी नियम की पाबंदी आवश्यक नहीं है। फिर भी, कुछ लेखक ‘और’ के पहले अल्पविराम का चिह्न लगाते हैं।

२. जहाँ शब्दों की पुनरावृत्ति की जाए और भावातिरेक में उनपर विशेष बल दिया जाए, वहाँ अल्पविराम का प्रयोग होता है। जैसे-

    वह दूर से, बहुत दूर से आ रहा है।

    सुनो, सुनो, वह गा रही है।

    नहीं, नहीं, ऐसा कभी नहीं हो सकता।

यदि ये बातें नाटकीय ढंग से कही जाएँ, तो अल्पविराम के स्थान पर विस्मयादिबोधक चिह्न लगाए जा सकते हैं।

३. यदि वाक्य में कोई अंतर्वर्ती पदांश (parenthesis) या वाक्यखंड आ जाए, तो अल्पविराम का प्रयोग किया जा सकता है। जैसे-

श्री रमणलाल देसाई के युग का ग्रामसेवक, जेल में गया हुआ सत्याग्रही कहानी-लेखक, अब कहाँ है ?

क्रोध, चाहे जैसा भी हो, मनुष्य को दुर्बल बनाता है। उपन्यास की संभावनाएँ अब क्या हैं और विशेषकर मेरे लिए कितनी क्या हो सकती है, यह नहीं जानता।

सेठ फूलचंद, चारों बेटों के नाम, कुल १२,००० रुपए छोड़ गए थे।

इस प्रकार के अंतर्वर्ती उपवाक्यखंडों में अल्पविराम का प्रयोग प्रायः अँगरेजी की वाक्य-रचना का प्रभाव लिए होता है। हिंदी कथासाहित्य में आज इसका प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है। इन प्रयोगों से निश्चय ही वाक्य के अंतर्वर्ती भाव तथा विचार स्पष्ट होते हैं। किंतु, अँगरेजी में इस प्रकार के प्रयोगों की अतिशयता है । वहाँ वाक्य के बीच too, however, such as, as if notwithstanding जैसे शब्दों के पहले और बाद भी अल्पविराम का प्रयोग होता है। जैसे-

     This, however, is certain.

   And then, too, there is a further reason.

    The story, such as it is, may be

          summarised as follows.

हिंदी में भी अँगरेजी के अनुकरण पर निम्नलिखित वाक्यों में अल्पविराम का प्रयोग हुआ है।

  •      निश्चय ही, यह सत्य है।
  •    फिर भी, वह एक अच्छा आदमी है।
  •      किंतु, मैं ऐसा नहीं मानता।
  •      उदाहरण के लिए, ऐसा कहा जा सकता है।
  •        तो, तुम जा सकते हो।
  •          और, एक तुम हो।
  •       वस्तुतः, यह तुम्हारा भ्रम है।
  •        अतः, उसे आना ही चाहिए।

निस्संदेह, हिंदी को अँगरेजी से काम की अच्छी बातें लेनी चाहिए, किंतु जहाँ तक विरामचिह्नों को अपनाने की बात है, इसमें थोड़ी सावधानी और मर्यादा बरतने की आवश्यकता है। सच तो यह है कि अँगरेजी में प्रयुक्त विरामचिह्न अँगरेजी के बोलने के विशिष्ट तौर-तरीकों और भौगोलिक स्थितियों से प्रभावित होने के कारण उनकी उच्चारणविधि हिंदी से भिन्न है। ऐसी स्थिति में यह कोई आवश्यक नहीं कि हर हालत में हम उनका अनुकरण करें ही। हाँ, कथासाहित्य, नाटक, रूपक और एकांकियों में इनकी थोड़ी बहुत छूट दी जा सकती है; क्योंकि साहित्य के इन रूपों में मनोभावों की अभिव्यक्ति अधिक होती है।

४. यदि वाक्य के बीच पर, इसी से, इसलिए, किंतु, परंतु, अतः, क्योंकि, जिससे, तथापि इत्यादि अव्ययों का प्रयोग होता हो, तो इनके पहले अल्पविराम लगाया जा सकता है। जैसे—

लिपियाँ अलग रह सकती हैं, पर भाषा हिंदी ही रहे।

यह लड़का पढ़ने में तेज है, इसी से लोग इसे चाहते हैं। आज मैं स्कूल नहीं जाऊँगा, क्योंकि काम पूरा नहीं किया है।

ऐसा कोई काम न करो, जिससे तुम्हारी बदनामी हो । उसने परिश्रम किया, अतएव परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ।

मैं कल घर जाता, किंतु एक आवश्यक कार्य आ गया

५. जहाँ किसी व्यक्ति को संबोधित किया जाए, वहाँ     

अल्पविराम लगता है। जैसे-

   सज्जनों, समय आ गया है, सावधान हो जाओ।

   प्रिय महाशय, मैं आपका आभारी हूँ।

   मोहन, अब तुम घर जा सकते हो।

 देवियों और सज्जनों, याद रखें, देश पर संकट छाया है।

यहाँ हमें अँगरेजी के अनावश्यक अनुकरण से बचना चाहिए। अँगरेजी में किसी व्यक्ति का विशेष परिचय देते समय उसके नाम के पहले और बाद अल्पविराम का प्रयोग इस प्रकार होता है-

General Wolf, the hero of Quebec, was born at Westerham.

Eliot, the great poet and critic, was a scholar.

हिंदी में यदि इनका हू-ब-हू अनुवाद किया जाए, तो वह हि की प्रकृति और वाक्य-रचना से मेल नहीं खाएगा-

जेनरल वुल्फ, क्वीबेक का नायक, वेस्टरहैम में पैदा हुआ था ।

इलियट, महान कवि और आलोचक, बड़े विद्वान थे । वस्तुतः हिंदी में इनका अनुवाद इस प्रकार होना चाहिए- क्वीबेक के नायक जेनरल वुल्फ का जन्म वेस्टरहैम में हुआ था ।

महान कवि और आलोचक इलियट बड़े विद्वान थे।

६. यदि वाक्य में प्रयुक्त किसी व्यक्ति या वस्तु की विशिष्टता किसी संबंधवाचक सर्वनाम के माध्यम से बतानी हो, तो वहाँ अल्पविराम का प्रयोग निम्नलिखित रीति से किया जा सकता है-

मेरा भाई, जो एक इंजीनियर है, इंगलैंड गया है। दो यात्री, जो रेल दुर्घटना के शिकार हुए थे, अब अच्छे हैं।

यह कहानी, जो किसी मजदूर के जीवन से संबद्ध है, बड़ी मार्मिक है।

७. अँगरेजी में दो समान वैकल्पिक वस्तुओं तथा स्थानों की ‘अथवा’, ‘या’ आदि से संबद्ध करने पर उनके पहले अल्पविराम लगाया जाता है। जैसे-

Constantinople, or Istanbul, was the former capital of Turkey.

Nitre, or salt petre, is dug from the earth.

इसके ठीक विपरीत, दो भिन्न वैकल्पिक वस्तुओं तथा स्थानों को ‘अथवा’, ‘या’ आदि से जोड़ने की स्थिति में ‘अथवा’, ‘या’ आदि के पहले अल्पविराम नहीं लगाया जाता है। जैसे-

I should like to live in Devon or Cornwall. He came from Kent or Sussex.

हिंदी में उक्त नियमों का पालन, खेद है, कड़ाई से नहीं होता। हिंदी भाषा में सामान्यतः ‘अथवा’, ‘या’ आदि के पहले अल्पविराम का चिह्न नहीं लगता है। जैसे—

पाटलिपुत्र या कुसुमपुर भारत की पुरानी राजधानी था। कल मोहन अथवा हरि कोलकाता जाएगा।

८. जिस वाक्य में ‘वह’, ‘यह’, ‘तब’, ‘तो’, ‘या’, ‘अब’ इत्यादि लुप्त हों, वहाँ अल्पविराम का प्रयोग किया जा सकता है। जैसे-

मैं जो कहता हूँ, कान लगाकर सुनो। (यहाँ ‘वह’ लुप्त है।)

उन्हें कब छुट्टी मिलेगी, कह नहीं सकता। (यहाँ ‘यह’ लुप्त है।)

जब करना ही है, कर डालो। (यहाँ ‘तब’ लुप्त है ।) कहना था सो कह दिया, तुम जानो । (यहाँ ‘अब’ लुप्त है ।)

यदि आप कोलकाता से लौटें, मेरे लिए रसगुल्ले लेते आइएगा। (यहाँ ‘तो’ लुप्त है।)

वह जहाँ जाता है, बैठ जाता है। (यहाँ ‘वहाँ’ लुप्त है।)

९. किसी व्यक्ति की उक्ति के पहले अल्पविराम का प्रयोग होता है। जैसे— मोहन ने कहा, “मैं कल पटना जाऊँगा । “

इस वाक्य को इस प्रकार भी लिखा जा सकता है— ‘मोहन ने कहा कि मैं कल पटना जाऊँगा ।’ कुछ लोग ‘कि’ के बाद अल्पविराम लगाते हैं, लेकिन ऐसा करना ठीक नहीं है।

यथा-

      राम ने कहा कि, मैं कल पटना जाऊँगा ।

ऐसा लिखना भद्दा है। ‘कि’ स्वयं अल्पविराम है; अतः इसके बाद एक और अल्पविराम लगाना कोई अर्थ नहीं रखता। इसलिए, उचित तो यह होगा कि चाहे तो हम लिखें- ‘राम ने कहा, ‘मैं कल पटना जाऊँगा, अथवा लिखें- ‘राम ने कहा कि मैं कल पटना जाऊँगा। दोनों शुद्ध होंगे।

१०. बस, हाँ, नहीं, सचमुच, अतः, वस्तुतः, अच्छा-जैसे शब्दों से आरंभ होनेवाले वाक्यों में इन शब्दों के बाद अल्पविराम लगता है। जैसे-

  •        बस, हो गया, रहने दीजिए।
  •        हाँ, तुम ऐसा कह सकते हो।
  •        नहीं, ऐसा नहीं हो सकता ।
  •         सचमुच, तुम बड़े नादान हो ।
  •         अतः, तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए।
  •            वस्तुतः, वह पागल है।
  •          अच्छा, तो लीजिए, चलिए ।

१. जब किसी लंबे वाक्य में एक से अधिक स्वतंत्र वाक्यांशों का प्रयोग हो, तब अल्पविराम का प्रयोग आवश्यक हो जाता है। जैसे

चाहती थी, ऐसे बोलूँ, जैसे कोयल प्रथम किरण से बोलती है, जब वह उसमें स्पर्श की सरसराहट भर देती है, ऐसे बोलूँ, जैसे कचनार के फूलों के बीच से वह बुलबुल बोल रही है, जो जितना भी धीरे बोलती है, फूलों के खुले मुँह से उतने ही मुखर बोल झर-झर पड़ते हैं।

योजक चिह्न ( – ) (Yojak Chinh)

हिंदी में अल्पविराम के बाद योजक चिह्न ( – ) का अत्यधिक प्रयोग होता है। पर, इसके दुष्प्रयोग भी कम नहीं हुए। हिंदी व्याकरण की पुस्तकों में इसके प्रयोग के संबंध में बहुत कम लिखा गया है। अतः, इसके प्रयोग की विधियाँ स्पष्ट नहीं होतीं । परिणाम यह है कि हिंदी के लेखक इसका मनमाना व्यवहार करते हैं। हिंदी के विद्वानों को इस ओर ध्यान देना चाहिए। यहाँ मेरा विवेचन एक विनीत प्रयासमात्र है।

भाषाविज्ञान की दृष्टि से हिंदी भाषा की प्रकृति विश्लेषणात्मक है, संस्कृत की तरह संश्लेषणात्मक नहीं। अतएव, हिंदी में सामासिक पदों या शब्दों का अधिक प्रयोग नहीं होता। संस्कृत में योजक चिह्न का प्रयोग नहीं होता। एक उदाहरण इस प्रकार है-

      गायंति रामनामानि सततं ये जना भुवि ।

      नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्यो पुनः पुनः ।।

हिंदी में इसका अनुवाद इस प्रकार होगा— पृथ्वी पर जो सदा राम-नाम गाते हैं, मैं उन्हें बार-बार प्रणाम करता हूँ। यहाँ संस्कृत में ‘रामनामानि’ लिखा गया और हिंदी में ‘राम-नाम’, संस्कृत में ‘पुनः पुनः’ लिखा गया और हिंदी में ‘बार-बार ‘। अतः, संस्कृत और हिंदी का अंतर स्पष्ट है।

प्रश्न उठता है कि योजक चिह्न लगाने की आवश्यकता ही क्या है। ऐसा करना क्यों जरूरी है ? इसके उत्तर में हम यह कहना चाहेंगे कि वाक्य में प्रयुक्त शब्द और उनके अर्थ को योजक चिह्न चमका देता है। यह किसी शब्द के उच्चारण अथवा वर्तनी को भी स्पष्ट करता है । श्रीयुत रामचंद्र वर्मा का ठीक ही कहना है कि यदि योजक चिह्न का ठीक-ठीक ध्यान न रखा जाए, तो अर्थ और उच्चारण से संबद्ध अनेक प्रकार के भ्रम हो सकते हैं। इस संबंध में वर्माजी ने ‘भ्रम’ के कुछ उदाहरण इस प्रकार दिए हैं-

(क) ‘उपमाता’ का अर्थ ‘उपमा देनेवाला’ भी है और ‘सौतेली माँ भी । यदि लेखक को दूसरा अर्थ अभीष्ट है, तो ‘उप’ और ‘माता’ के बीच योजक चिह्न लगाना आवश्यक है, नहीं तो अर्थ स्पष्ट नहीं होगा और पाठक को व्यर्थ ही मुसीबत मोल लेनी होगी।

(ख) ‘भू-तत्त्व’ का अर्थ होगा— भूमि या पृथ्वी से संबद्ध तत्त्व; पर यदि ‘भूतत्त्व’ लिखा जाए, तो ‘भूत’ शब्द का भाववाचक संज्ञारूप ही माना और समझा जाएगा।

(ग) इसी तरह, ‘कुशासन‘ का अर्थ ‘बुरा शासन भी होगा और ‘कुश से बना हुआ आसन’ भी । यदि पहला अर्थ अभीष्ट है, तो ‘कु’ के बाद योजक चिह्न लगाना आवश्यक है।

उक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि योजक चिह्न की अपनी उपयोगिता है और शब्दों के निर्माण में इसका बड़ा महत्त्व है। किंतु, हिंदी में इसके प्रयोग के नियम निर्धारित नहीं हैं, इसलिए हिंदी के लेखक इस ओर पूरे स्वछंद है। यहाँ एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि हिंदी गद्य के नए विकसित रूपों के आधार पर ही योजक चिह्न की प्रयोगविधि निर्धारित की जानी चाहिए। पुराने गद्य में तो इसकी बड़ी दुर्दशा है। मैंने योजक चिह्न के प्रयोग के निम्नलिखित नियम स्थिर किए हैं-

Rule १. योजक चिह्न सामान्यतः दो शब्दों को जोड़ता है और दोनों को मिलाकर एक समस्त पद बनाता है, लेकिन दोनों का स्वतंत्र अस्तित्व बना जैसे – माता-पिता, लड़का-लड़की, धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य इत्यादि । इन उदाहरणों से यह रहता है; नियम इस प्रकार बनाया जा सकता है कि जिन पदों के दोनों खंड प्रधान हों और जिनमें ‘और’ अनुक्त या लुप्त हो, वहाँ योजक चिह्न लगाया जाता है; जैसे- घर-द्वार = घर और द्वार, दाल-रोटी = दाल और रोटी, दही-बड़ा दही और बड़ा, सीता-राम सीता = और राम, फल-फूल = फल और फूल ।

Rule २. दो विपरीतार्थक शब्दों के बीच योजक चिह्न लगाया जाता है; जैसे- ऊपर-नीचे, लेन-देन, माता-पिता, रात-दिन, आकाश-पाताल, पाप-पुण्य, स्त्री-पुरुष, भाई-बहन, देर-सबेर, आगा-पीछा, बेटा-बेटी, ऊँच-नीच, गरीब-अमीर, शुभ-अशुभ, लघु-गुरु, विरह-मिलन, स्वर्ग-नरक, जय-पराजय, देश-विदेश, झूठ-सच, जन्म-मरण, जड़-चेतन, योगी-भोगी, हानि-लाभ, मानव-दानव ।

Rule ३. द्वंद्वसमास में कभी-कभी ऐसे पदों का भी प्रयोग होता है, जिनके अर्थ प्राय: समान होते हैं। ये पद बोलचाल में प्रयुक्त होते हैं, ऐसे पदों के बीच योजक चिह्न लगाया जाता है। ये ‘एकार्थबोधक सहचर शब्द’ कहलाते हैं; जैसे मान-मर्यादा, हाट-बाजार, दीन-दुखी, बल-वीर्य, मणि- माणिवय, सेठ साहूकार, सड़ा-गला, भूल-चूक, रुपया-पैसा, देव- पितर समझ-बूझ, संबंध-संपर्क, भोग-विलास, हिसाब-किताब, भूत-प्रेत, चमक-दमक, जी-जान, सागपात, बाल-बच्चा, मार-पीट, कौल-करार, शोर-गुल, धूम-धाम, हँसी-खुशी, चाल-चलन, कपड़ा-लत्ता, बरतन-बासन, जीव-जंतु, कूड़ा-कचरा, नौकर-चाकर, सजा-धजा नपा-तुला ।

Rule ४. जब दो विशेषणपदों का संज्ञा के अर्थ में प्रयोग हो, वहाँ योजक चिह्न लगता है; जैसे- लूला-लंगड़ा, भूखा-प्यासा, अंधा-बहरा ।

Rule ५. जब दो शब्दों में एक सार्थक और दूसरा निरर्थक हो, तब वहाँ भी योजक चिह्न लगाया जाता है; जैसे— परमात्मा-अरमात्मा, उलटा-पुलटा, अनाप-शनाप, रोटी-बोटी, खाना वाना, पानी वानी, झूठ-मूठ।

Rule ६. जब दो शुद्ध संयुक्त क्रियाएँ एक साथ प्रयुक्त हों, तब दोनों के बीच योजक चिह्न लगता है; जैसे— पढ़ना-लिखना, उठना-बैठना, मिलना-जुलना, मारना पीटना, खाना-पीना, आना-जाना करना धरना, दौड़ना-धूपना, मरना जीना, कहना-सुनना, समझना – बूझना, उठना-गिरना, रहना सहना, सोना-जागना ।

Rule ७. क्रिया की मूलधातु के साथ आई प्रेरणार्थक क्रियाओं के बीच भी योजक चिह्न का प्रयोग होता है; जैसे— उड़ना उड़ाना, चलना चलाना, गिरना-गिराना, फैलना-फैलाना, पीना-पिलाना, ओढ़ना- उढ़ाना सोना- सुलाना सीखना सिखाना, लेटना-लिटाना ।

Rule ८. दो प्रेरणार्थक क्रियाओं के बीच भी योजक चिह्न लगाया जाता है; जैसे- डराना डरवाना, कटाना कटवाना, कराना करवाना। भिंगाना – भिंगवाना, जिताना – जितवाना, चलाना चलवाना,

Rule ९. जब एक ही संज्ञा दो बार प्रयुक्त हो, तब संज्ञाओं के बीच योजक चिह्न लगता है। इसे ‘द्विरुक्ति’ कहते हैं। इसके उदाहरण हैं— गली-गली, नगर-नगर, द्वार-द्वार, गाँव-गाँव, शहर-शहर, घर-घर, कोना-कोना, चप्पा-चप्पा, कण-कण, बूँद-बूँद, राम-राम, वन-वन, बात-बात, बच्चा-बच्चा, रोम-रोम ।

Rule १०. परिणामवाचक और रीतिवाचक क्रियाविशेषण में प्रयुक्त दो अव्ययों तथा ‘ही’, ‘से’, ‘का’, ‘न’ आदि के बीच योजक चिह्न का व्यवहार होता है; जैसे- बहुत-बहुत, थोड़ा-थोड़ा थोड़ा-बहुत, कम-कम, कम-बेश, धीरे-धीरे, जैसे-तैसे, आप ही आप बाहर- भीतर, आगे-पीछे, यहाँ-वहाँ, अभी-अभी, जहाँ-तहाँ आप से- आप, ज्यों-का-त्यों, कुछ-न-कुछ ऐसा-वैसा, जब-तब तब तब, किसी-न-किसी, साथ-साथ ।

Rule ११. निश्चित संख्यावाचक विशेषण के जब दो पद एक साथ प्रयुक्त हों, तब दोनों के बीच योजक चिह्न लगता है; जैसे—दो-चार, एक-एक, एक-दो, दस-बारह, दस बीस, पहला- दूसरा, चौथा-पाँचवाँ । चार-चार, नौ-छह,

Rule १२. अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण में जब ‘सा’, ‘से’ आदि जोड़े जाएँ, तब दोनों के बीच योजक चिह्न लगाया जाता है; जैसे—बहुत-सी बातें, कम-से-कम, बहुत-से लोग, बहुत सा रुपया, अधिक-से-अधिक, थोड़ा-सा काम |

Rule १३. गुणवाचक विशेषण में भी ‘सा’ जोड़कर योजक चिह्न लगाया जाता है; जैसे—बड़ा-सा पेड़, बड़े-से-बड़े लोग, ठिंगना-सा आदमी।

Rule १४. जब किसी पद का विशेषण नहीं बनता, तब उस पद के साथ ‘संबंधी’ पद जोड़कर दोनों के बीच योजक चिह्न लगाया जाता है; जैसे- भाषा संबंधी चर्चा, पृथ्वी-संबंधी तत्त्व, विद्यालय संबंधी बातें, सीता संबधी वार्त्ता ।

यहाँ ध्यान देने की बात है कि जिन शब्दों के विशेषणपद बन चुके हैं या बन सकते हैं. वैसे शब्दों के साथ ‘संबंधी’ जोड़ना उचित नहीं । यहाँ ‘भाषा संबंधी’ के स्थान पर ‘भाषागत’ या ‘भाषिक’ या ‘भाषाई’ विशेषण लिखा जाना चाहिए। इसी तरह, ‘पृथ्वी-संबंधी’ के लिए ‘पार्थिव’ विशेषण लिखा जाना चाहिए। हाँ, ‘विद्यालय’ और ‘सीता’ के साथ ‘संबंधी’ का प्रयोग किया जा सकता है, क्योंकि इन दो शब्दों के विशेषणरूप प्रचलित नहीं हैं। आशय यह कि सभी प्रकार के शब्दों के साथ ‘संबंधी’ जोड़ना ठीक नहीं।

Rule १५. जब दो शब्दों के बीच संबंधकारक के चिह्न – का, के और की- – लुप्त या अनुक्त हों, तब दोनों के बीच योजक चिह्न लगाया जाता है। ऐसे शब्दों को हम संधि या समास के नियमों से अनुशासित नहीं कर सकते। इनके दोनों पद स्वतंत्र होते हैं; जैसे- शब्द-सागर, लेखन कला, शब्द-भेद, संत-मत, मानव-जीवन, मानव शरीर, लीला – भूमि, कृष्ण लीला, विचार श्रृंखला, रावण वध, राम नाम, प्रकाश स्तंभ।

Rule १६. लिखते समयं यदि कोई शब्द पंक्ति के अंत में पूरा न लिखा जा सके, तो उसके पहले आधे खंड को पंक्ति के अंत में रखकर उसके बाद योजक चिह्न लगाया जाता है। ऐसी हालत में शब्द को ‘शब्दखंड’ या ‘सिलेबुल’ या पूरे ‘पद’ पर तोड़ना चाहिए। जिन शब्दों के योग में योजक चिह्न आवश्यक है, उन शब्दों को पंक्ति में तोड़ना हो तो शब्द के प्रथम अंश के बाद योजक चिह्न देकर दूसरी पंक्ति दूसरे अंश के पहले योजक देकर जारी करनी चाहिए; जैसे—

कल सुबह जब मैं टहलने निकला तब अचानक हरिहर से भेंट हो गई जो आकाश- वाणी भवन के मुख्य द्वार के सामने अखबार पढ़ रहा था।

‘आकाशवाणी’ एक शब्द है। अक्षर-संयोजन के समय ‘आकाश’ पर पहली पंक्ति पूरी होती है। अतः, ऊपर निर्दिष्ट नियम के अनुसार दूसरी पंक्ति में ‘वाणी’ शब्द के अक्षर-संयोजन के पूर्व पहली पंक्ति में ‘आकाश’ के बाद योजक चिह्न (-) लगाया गया है।

योजक चिह्न का प्रयोग कहाँ नहीं होना चाहिए – हिंदी के लेखक योजक चिह्न के प्रयोग में काफी उदारता से काम लेते हैं। ये अब योजक चिह्न को धीरे-धीरे हटाते जा रहे हैं। भारत की स्वतंत्रता के पहले हिंदी में निम्नलिखित शब्दों के बीच योजक चिह्न लगता था, किंतु अब इसे हटा दिया गया है। खासकर पत्र-पत्रिकाओं में ये अधिक देखने को मिलते हैं। ये शब्द इस प्रकार हैं-

रजतपट, कार्यक्रम, जनरुचि, लोकमत, जनपथ, योगदान, चित्रकला, पटकथा, मध्यवर्ग, निम्नवर्ग, उच्चवर्ग, आकाशवाणी, कामकाज, सूचीपत्र, सीमारेखा, वर्षगाँठ, जन्मदिन, आसपास, अंधविश्वास, गतिविधि, आत्मविश्वास, आत्मसमर्पण, रक्तदान, पदचिह्न, आत्मनिर्भर, मानपत्र, प्रशंसापत्र, आवेदनपत्र, अभिनंदनपत्र परीक्षाफल, हिंदी परिषद्, हिंदी संसार, हिंदी विभाग, राष्ट्रभाषा

निश्चय ही, यह अँगरेजी का प्रभाव है। इस प्रभाव के फलस्वरूप आज नगरों, संस्थाओं, दूकानों, समितियों, आयोगों, कल-कारखानों और पत्र-पत्रिकाओं के नाम, बिना योजक चिह्न लगाए लिखे जा रहे हैं। जैसे-

सोवियत भूमि, नेहरू पुरस्कार समिति, शांति दल, बिहार सहकारी समिति,

मगध विश्वविद्यालय, राजेंद्र नगर, पटेल कॉलेज, प्रसारण मंत्री, संगीत नाटक

अकादमी, बिहार विधान परिषद्, नागरी प्रचारिणी सभा, बिहार राष्ट्रभाषा

परिषद्, दीक्षांत समारोह, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, पटना सचिवालय, टाटा

आयरन कंपनी, बोकारो स्टील कॉरपोरेशन, शिक्षा आयोग, कॉलेज पत्रिका,

संयुक्त राष्ट्रसंघ, प्रांतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन ।

इन शब्दों के प्रयोग से यह स्पष्ट है कि हिंदी पर अँगरेजी का प्रभाव है। एक हद तक यह ठीक भी है । निस्संदेह, इन शब्दों की अपनी उपयोगिता है। इसे हम अँगरेजी का अंधानुकरण नहीं कहेंगे। यह हमारी उदारता है कि हम अँगरेजी से उपयोगी तत्त्वों को अपना लेने में सुरुचि और तत्परता से काम ले रहे हैं। बात-बात में योजक चिह्न का व्यवहार भाषा को बोझिल बना देगा। इस दिशा में हमारी देवभाषा संस्कृत पहले से सावधान रही। संस्कृत में इसीलिए योजक चिह्न का प्रयोग नहीं के बराबर है। संस्कृत ने संधि और समास के नियम बनाकर योजक चिह्न की बहुतेरी समस्याओं का हल निकाल लिया है। हिंदी को यह विरासत संस्कृत से मिली है। संधि और समास के नियमों से अनुशासित ऐसे हजारों शब्द हिंदी में चलते हैं, जिनमें योजक चिह्न का प्रयोग नहीं होता । वे अपने-आपमें समस्त पद बन गए हैं; जैसे-

तत्पुरुषसमास — राजमंत्री, गंगाजल, शोकाकुल, शरणागत, पाकिटमार, आकाशवाणी, कर्मपटु, देशांतर, जन्मांतर, देवालय, लखपती, पंकज, रेलकुली ।

तत्पुरुषसमास के नियम से अपरिचित रहने के कारण हिंदी में निम्नलिखित शब्द योजक चिह्नों के साथ लिखे गए हैं-

  • अशुद्ध            शुद्ध           अशुद्ध           शुद्ध
  • गंगा प्राप्त     गंगाप्राप्त       पद-च्युत        पदच्युत
  • मन-गढ़ंत      मनगढ़ंत       पन- डब्बा       पनडब्बा
  • मन-माना      मनमाना       रसोई-घर         रसोईघर
  • ईश्वर – दत्त     ईश्वरदत्त      आप-बीती       आपबीती
  • पुत्र-शोक       पुत्रशोक      जल – मग्न       जलमग्न
  • देश – निकाला देशनिकाला   गंगा-जल         गंगाजल
  • गुरु-भाई         गुरुभाई       डाक – घर         डाकघर
  • काम-चोर       कामचोर      जन्म- रोगी        जन्मरोगी
  • मुँह-तोड़        मुँह तोड़       राष्ट्र-भाषा         राष्ट्रभाषा
  • गिरह – कट     गिरहकट      आनंद-मग्न     आनंदमग्न
  • मद-माता        मदमाता         घुड़-दौड़        घुड़दौड़
  • तिल-चट्टा       तिलचट्टा      दर्शन – मात्र      दर्शनमात्र

कर्मधारयसमास—कर्मधारयसमास से बने शब्दों के प्रयोग में भी असावधानी पाई जाती है। कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं-

  • अशुद्ध             शुद्ध          अशुद्ध           शुद्ध
  • कमल – नयन  कमलनयन  कर – पल्लव      करपल्लव
  • चंद्र- मुख          चंद्रमुख     चरण-कमल    चरणकमल
  • गोबर – गणेश   गोबरगणेश   विद्या – धन      विद्याधन
  • डाक- गाडी       डाकगाड़ी    भव-सागर       भवसागर
  • रजत-कंकण     रजतकंकण   धर्म-शाला      धर्मशाला
  • अव्ययीभावसमास – अव्ययीभावसमास में भी योजक चिह्न के दुष्प्रयोग हुए हैं। जैसे-
  • अशुद्ध         शुद्ध           अशुद्ध            शुद्ध
  • दिन-रात     दिनरात       पहले-पहल       पहलेपहल
  • रात-भर      रातभर        रातो-रात          रातोरात
  • यथा-स्थान   यथास्थान    उप-नगर           उपनगर
  • मुँहा -मुँह      मुँहामुँह     यथा – शक्ति       यथाशक्ति
  • एक रुपया – मात्र  एक रुपया मात्र    आज-कल आजकल

द्विगुसमास – द्विगुसमास से बने सामासिक पदों में योजक चिह्न का प्रयोग नहीं होता है; जैसे- सप्तलोक, त्रिभुवन, पंचवटी, नवग्रह, सतसई, चवन्नी, चौमासा । अतः ‘सप्त-वर्षीय योजना’ लिखना ठीक नहीं होगा। यह अशुद्ध होगा।

द्वंद्वसमास की चर्चा हम ऊपर कर चुके हैं और यह कह चुके हैं कि इस समास से बने पदों में योजक चिह्न का प्रयोग बहुत अधिक होता है। ऊपर उदाहरण दिए जा चुके हैं।

जिन शब्दों के अंत में पूर्वक, पूर्ण, मय, युक्त, व्यापी, द्वारा, रूपी, गण, भर, मात्र, स्वरूप इत्यादि जोड़े जाएँ, वहाँ योजक चिह्न का प्रयोग नहीं होना चाहिए। नई हिंदी में इनका व्यवहार इस प्रकार होता है-

  • अशुद्ध           शुद्ध            
  • पूर्वक- श्रद्धा – पूर्वक  श्रद्धापूर्वक 
  • द्वारा – परिषद्-द्वारा    परिषद् द्वारा
  • पूर्ण — विनोद-पूर्ण  विनोदपूर्ण 
  • व्यापी – भारत -व्यापी भारतव्यापी
  • मय— मंगल – मय मंगलमय
  • रूपी – कृष्ण -रूपी कृष्णरूपी
  • युक्त — योग-युक्त  योगयुक्त 
  • मात्र – मानव- मात्र मानवमात्र
  • गण– तारा- गण तारागण
  • स्वरूप – परिणाम – स्वरूप परिणामस्वरूप
  • भर–दिन-भर    दिनभर

विशेष्य और विशेषण के बीच योजक चिह्न का प्रयोग नहीं होना चाहिए। जैसे

  • अशुद्ध          शुद्ध              अशुद्ध          शुद्ध
  • काशी- वासी  काशीवासी   अहिंदी -भाषी  अहिंदीभाषी
  • सहेतुक – वाक्य   सहेतुक वाक्य    हिंदी -फिल्म हिंदी फिल्म
  • बाह्य -आडंबर   बाह्य आडंबर  सांध्य – गोष्ठी  सांध्य गोष्ठी
  • मातृ-भक्ति   मातृभक्ति   आदर्श-मैत्री    आदर्श मैत्री
  • मातृ-भाषा   मातृभाषा   हिंदू-विवाह     हिंदू विवाह
  • विभिन्न – ऋतु  विभिन्न ऋतु    अनधिकार – चेष्टा  अनधिकार चेष्टा
  • रसीली – कहानियाँ  रसीली कहानियाँ   शुभ -समाचार शुभ समाचार

कुछ लोग नञ् समास से बने नकारात्म्क पदों में योजक चिह्न लगाते हैं; जैसे – ना- खुश, अन-पढ़, अन-सुन, बे-बुनियाद, अन-चाहा, बे-मजा, बे-शुमार, अन-गिनत। मेरी समझ से ऐसा करना ठीक नहीं। ये सारे शब्द या तो विदेशज हैं या देशज। यदि हम इन शब्दों में योजक चिह्न लगाते हैं तो ‘अ’ या ‘अन’ से लगनेवाले तत्सम और तद्भवों के साथ भी ऐसा करना होगा; जैसे – अनंत, अनाथ, अपवित्र अनादर, अनादि, अछूत, अनजान | हिंदी में ये शब्द स्थिर हो चुके हैं। हाँ, उर्दू, और अरबी से आनेवाले कुछ शब्दों में उच्चारण की स्पष्टता के लिए हम योजक चिह्न का प्रयोग कर सकते हैं; जैसे- -अंजुमन-ए-इस्लाम, आईन-ए-अकबरी, साल-ब-साल, रोज-ब-रोज, कदम-ब-कदम |

यहाँ हम यह भी स्पष्ट कर दें कि शब्दों के आरंभ में लगनेवाले उपसर्गों को योजक चिह्न लगाकर पृथक् करना ठीक नहीं है। पृथक् करने की राय अँगरेजी के अनुकरण पर दी जाती है। अँगरेजी के ये शब्द इस प्रकार लिखे जाते हैं-

  • अँगरेजी         हिंदी (अशुद्ध)          हिंदी (शुद्ध)
  • Vice-Chancellor  उप-कुलपति    उपकुलपति
  • Ex-soldier     भूतपूर्व-सैनिक      भूतपूर्व सैनिक
  • Non-cooperation  अ-सहयोग     असहयोग
  • Vice-Principal   उप-प्राचार्य         उपप्राचार्य
  • Vice-President   उप-सभापति     उपसभापति

पदनिर्माण का यह तरीका हिंदी की प्रकृति से मेल नहीं खाता। दूसरी बात यह है कि हिंदी में उपसर्गों के साथ योजक चिह्न लगाने की प्रथा नहीं है। जैसे-

  • उपसर्ग                   शब्द                पद
  • परा                        जय               पराजय
  • अनु                       क्रम               अनुक्रम
  • उप                        कार                उपकार
  • अति                      काल              अतिकाल
  • मनु                         ज                  मनुज

स्पष्ट है कि हिंदी में अँगरेजी की इस प्रकार की नकल नहीं चल सकती। एक उदाहरण इस प्रकार है— ‘The cow is a four-footed animal’ | हिंदी में इसका अनुवाद होगा — गाय एक चौपाया (‘चौ-पाया’ नहीं) जानवर है।

ऊपर हमने योजक चिह्न के प्रयोग का सामान्य परिचय सोदाहरण दिया है और पाया है कि हिंदी में पदों के निर्माण में और समस्त पदों की रचना में इसका बड़ा महत्त्व है, जो पदों के अर्थ और उच्चारण में चार चाँद लगा देता है। किंतु हमारी समझ से योजक चिह्न का अत्यधिक प्रयोग भाषा को जटिल और पदों को दुर्बोध बना देगा। इसका प्रयोग संयत और मर्यादित हो और अँगरेजी की व्यर्थ नकल न की जाए।

प्रश्नवाचक चिह्न ( ? ) Prashnvachak Chinh

प्रश्नवाचक चिह्न का प्रयोग निम्नलिखित अवस्थाओं में होता है—

. जहाँ प्रश्न करने या पूछे जाने का बोध हो। जैसे— क्या आप गया से आ रहे हैं?

२. जहाँ स्थिति निश्चित न हो। जैसे—

    आप शायद पटना के रहनेवाले हैं?

३. व्यंग्योक्तियों में। जैसे-

भ्रष्टाचार इस युग का सबसे बड़ा शिष्टाचार है, है न? जहाँ घूसखोरी का बाजार गर्म है, वहाँ ईमानदारी कैसे टिक सकती है ?

विस्मयादिबोधक चिह्न ( ! )

इसका प्रयोग हर्ष, विषाद, विस्मय, घृणा, आश्चर्य, करुणा, भय इत्यादि भाव व्यक्त करने के लिए निम्नलिखित स्थितियों में होता है—

१. आह्लादसूचक शब्दों, पदों और वाक्यों के अंत में इसका प्रयोग होता है। जैसे- वाह! तुम्हारे क्या कहने!

२. अपने से बड़े को सादर संबोधित करने में इस चिह्न का प्रयोग होता है। जैसे— हे राम! तुम मेरा दुःख दूर करो। हे ईश्वर! सबका कल्याण हो ।

३. जहाँ अपने से छोटों के प्रति शुभकामनाएँ और सद्भावनाएँ प्रकट की जाएँ। जैसे: – भगवान तुम्हारा भला करे! यशस्वी होओ ! उसका पुत्र चिरंजीवी हो ! प्रिय किशोर, स्नेहाशीर्वाद! जहाँ मन की हँसी-खुशी व्यक्त की जाए। जैसे-

४ कैसा निखरा रूप है ! तुम्हारी जीत होकर रही, शाबाश! वाह! कितना अच्छा गीत गाया तुमने !

द्रष्टव्य – विस्मयादिबोधक चिह्न में प्रश्नकर्ता उत्तर की अपेक्षा नहीं करता ।

उद्धरणचिह्न ( “‘ “) Uddharan Chihn 

उद्धरणचिह्न के दो रूप हैं— इकहरा (` `) और दुहरा ( ” “)।

१. जहाँ किसी पुस्तक से कोई वाक्य या अवतरण ज्यों-का-त्यों उद्धृत किया जाए, वहाँ दुहरे उद्धरणचिह्न का प्रयोग होता है और जहाँ कोई विशेष शब्द, पद, वाक्य-खंड इत्यादि उद्धृत किए जाएँ वहाँ इकहरे उद्धरण लगते हैं। जैसे-

“जीवन विश्व की संपत्ति है।”- – जयशंकर प्रसाद ‘कामायनी’ की कथा संक्षेप में लिखिए।

२. पुस्तक, समाचारपत्र, लेखक का उपनाम, लेख का शीर्षक इत्यादि उद्धृत करते समय इकहरे उद्धरणचिह्न का प्रयोग होता है। जैसे-

‘निराला’ पागल नहीं थे।

‘किशोर भारती’ का प्रकाशन हर महीने होता है।

‘जुही की कली’ का सारांश अपनी भाषा में लिखो । सिद्धराज ‘पागल’ एक अच्छे कवि हैं।

‘प्रदीप’ एक हिंदी दैनिक पत्र है।

३. महत्त्वपूर्ण कथन, कहावत, संधि आदि को उद्धृत करने में दुहरे उद्धरणचिह्न का प्रयोग होता है। जैसे- भारतेंदु ने कहा था- “देश को राष्ट्रीय साहित्य चाहिए। “

 

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